बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

उनके लिए युद्ध एक खेल था। वे आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वे तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो...

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रात के अंधेरे में शहर डराते नहीं; डर तब लगता है, जब उजाले में इंसानियत खोने लगे। डर तब लगता है, जब किसी अस्पताल की कतार में खड़ी बीमार मां को पीछे धकेलकर कोई सीना तानकर कहे, "जानते नहीं, मैं कौन हूं?

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साल 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियां सुनकर रूह कांप उठती है...

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कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे, कई भारी-भरकम ट्रंक और खनखनाते कनस्तर...

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कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था...

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“जब तोपें गरजती हैं, तो इंसानियत खामोश हो जाती है…”। पश्चिम एशिया का आसमान इन दिनों सिर्फ धुएं से नहीं, एक खौफनाक सन्नाटे से भी ढका है। मिसाइलों की लकीरें रात को चीरती हैं, ड्रोन मौत का पैगाम बनकर मंडरा रहे हैं, और हर विस्फोट के साथ ऐसा लगता है जैसे दुनिया एक कदम और कयामत के करीब पहुंच रही हो। हवा में बारूद ही नहीं, रेडियोएक्टिव डर भी तैर रहा है। कहीं कोई लाल बटन दबा, और पूरी इंसानियत एक न्यूक्लियर ब्लैकआउट में डूब सकती है। यह कोई फिल्मी सीन नहीं। यह हमारे समय का स्याह सच है...

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