जब भक्ति का ‘वॉल्यूम’ बढ़ जाए और पूरा मोहल्ला ‘परेशान’ हो जाए…

त्योहार खुशियां लाते हैं। वे लोगों को जोड़ते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं। लेकिन, जब भक्ति का वॉल्यूम इतना बढ़ जाए कि पूरा मोहल्ला परेशान हो जाए, तो सवाल उठना लाज़िमी है।

कभी त्योहार सादगी, श्रद्धा, लोक संगीत और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े थे। मिट्टी की मूर्ति बनती थी और श्रद्धा के साथ उसका विसर्जन होता था। आज तस्वीर काफी बदल गई है।

ऊंचे लाउडस्पीकर, डीजे, बड़े साउंड सिस्टम, रीमिक्स गाने और लंबी शोभायात्राएं त्योहारों का हिस्सा बनते जा रहे हैं। कई बार भक्ति कम और शोर ज्यादा सुनाई देता है। त्योहारों का प्रदूषण केवल पानी और मूर्तियों तक सीमित नहीं है। शोर भी अब गंभीर प्रदूषण बन चुका है।

कर्नाटक के कोडागु जिले में पुलिस ने हाल ही में आयोजकों को ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का पालन करने की चेतावनी दी है। संदेश साफ है कि उत्सव मनाइए, लेकिन कानून की हद में। कानून भी बिल्कुल स्पष्ट है।

'पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986' के तहत 'ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' बनाए गए हैं। इनमें अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा तय है। लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल पर भी नियम लागू होते हैं। सामान्यतः रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक तेज आवाज पर रोक रहती है।

अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी इलाकों में तो और ज्यादा एहतियात जरूरी है। आखिर किसी मरीज की बीमारी, किसी बच्चे की नींद और किसी विद्यार्थी की पढ़ाई पर डीजे की मर्जी क्यों चले? यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि कानून है, फिर अमल कहां है?

हर त्योहार पर अक्सर वही कहानी दोहराई जाती है। आयोजक अनुमति लेते हैं और नियम मानने का भरोसा देते हैं। फिर, डीजे शुरू होता है। आवाज बढ़ती जाती है और पूरा मोहल्ला बिना अपनी मर्जी के कार्यक्रम का हिस्सा बन जाता है।

शिकायत करने पर कभी पुलिस आती है, कभी नहीं। कई बार चेतावनी देकर मामला खत्म हो जाता है। इससे गलत संदेश जाता है कि त्योहारों में नियम थोड़े ढीले चल सकते हैं। यही सोच असली समस्या है। प्रशासन की अपनी मुश्किलें भी हैं। एक साथ कई कार्यक्रम होते हैं। पुलिस बल सीमित होता है। ध्वनि मापने के उपकरण भी हर जगह तुरंत उपलब्ध नहीं होते। लेकिन, इन परेशानियों का अर्थ यह नहीं कि कानून को ताक पर रख दिया जाए।

गणेश चतुर्थी का इतिहास हमें उत्सव की असली ताकत भी याद दिलाता है। 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया। इसका उद्देश्य लोगों को जोड़ना और सामाजिक चेतना पैदा करना था।

आज वही उत्सव कई जगहों पर शक्ति प्रदर्शन की होड़ में बदलता दिखाई देता है। बड़े मंच, बड़े स्पीकर, बड़े जुलूस और उससे भी बड़ा शोर, मानो भक्ति की गहराई डेसिबल से मापी जाने लगी हो।

यह भी भूलना नहीं चाहिए कि विसर्जन के दौरान भीड़, यातायात, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां पैदा होती हैं। उत्सव जब दूसरे नागरिकों के अधिकारों से टकराने लगे, तब आत्ममंथन जरूरी है। इसका अर्थ त्योहार बंद करना नहीं है। जरूरत त्योहारों की मूल भावना वापस लाने की है।

आयोजकों को अनुमति पहले लेनी चाहिए। तय रास्ते, समय और ध्वनि सीमा का पालन होना चाहिए। डीजे मनोरंजन करे, पड़ोसियों को परेशान न करे। मरीज को शांति चाहिए। बच्चे को नींद चाहिए। बुजुर्ग को सुकून चाहिए। विद्यार्थी को पढ़ाई के लिए खामोशी चाहिए। इन जरूरतों का सम्मान करना भी धर्म और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

पर्यावरण की चिंता भी उतनी ही जरूरी है। पीओपी की मूर्तियां, रासायनिक रंग और प्रदूषित जल विसर्जन हमारी आस्था की कीमत नहीं हो सकते। मिट्टी की मूर्ति, प्राकृतिक रंग और जिम्मेदार विसर्जन उत्सव को सुंदर भी बनाते हैं और टिकाऊ भी।

आखिर भक्ति वह नहीं, जो दूसरों को बेचैन कर दे। धर्म वह नहीं, जो पड़ोसी की नींद हराम कर दे। गणेश को विघ्न विनाशक कहा जाता है, बाधाओं को दूर करने वाला। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा यही होगी कि हमारा उत्सव खुद किसी के लिए नया विघ्न न बने।

आस्था और पर्यावरण साथ चल सकते हैं। आस्था और कानून भी साथ चल सकते हैं। लेकिन आस्था और सार्वजनिक परेशानी का कोई मेल नहीं है। त्योहार हमारी खुशी हैं। उन्हें किसी और की सजा नहीं बनना चाहिए। त्योहार श्रद्धा के हों, प्रदूषण के नहीं।



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