26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊंचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबे ने नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।
इस आपदा ने नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों व चीन के ग्यीरोंग काउंटी को प्रभावित किया। अब तक 1060 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। दोनों तरफ सैकड़ों से लेकर कई हजारों तक लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें कई विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। गांव, पुल, सड़कें और कई निर्माण नष्ट हो गए। बचाव कार्य जारी है, लेकिन आगे भी बाढ़ का खतरा बना हुआ है।
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यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक चेतावनी है। हिमालय दुनिया के सबसे कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में से एक है। चीन ने भारत और नेपाल की सीमा पर सड़कें, सैन्य ठिकाने, सुरंगें, बांध और बिजली परियोजनाएं बड़े पैमाने पर बनाई हैं। इन कामों से पहाड़ों की ढलानें, नदियों का रास्ता और मिट्टी का संतुलन बिगड़ा है। चीन ने वैज्ञानिकों की चेतावनियों और नीचे रहने वाले देशों पर पड़ने वाले असर को बार-बार कम करके आंका है।
साल 1978 में मैंने टिहरी बांध के विवाद पर लिखा था और हिमालय में बड़े बांध बनाने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। पानी, बिजली और विकास के फायदे तो हैं। लेकिन, भूकंप वाले इलाके में और चीन की सीमा के पास इतने बड़े निर्माण के खतरे भी बहुत हैं। आलोचकों ने कहा था कि बड़ा भूकंप या कोई हादसा होने पर बाढ़ उत्तर भारत के मैदानों तक पहुंच सकती है। वही सवाल आज भी खड़ा है कि क्या फायदे इतने बड़े खतरे के लायक हैं?
भूवैज्ञानिक लंबे समय से कहते आए हैं कि हिमालय पृथ्वी की पपड़ी का कमजोर और सक्रिय हिस्सा है। यहां लगातार उठान, दरारें और दबाव चल रहे हैं। ऊपरी शिवालिक की ढलानें चिकनी मिट्टी और रेत की वजह से अस्थिर हैं। बड़े निर्माण पहाड़ी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पहाड़ों का तेज उठना और भूकंप की गतिविधि उनकी अस्थिरता को साफ दिखाती है। इसलिए, इस इलाके में बड़े बांध और जलाशय खास तौर पर खतरनाक हैं। ये बातें नई नहीं हैं। दशकों से वैज्ञानिक यही चेतावनी देते आए हैं।
चीन ने इन चेतावनियों को ज्यादातर नजरअंदाज किया है। शोधकर्ताओं ने बार-बार कहा है कि बांध टूटने या ग्लेशियर झीलों के फटने से बड़ी तबाही हो सकती है। खुदाई, सुरंगें और बड़े जलाशय ढलानों को कमजोर कर सकते हैं और पानी के सिस्टम को बिगाड़ सकते हैं। फिर भी निर्माण काम चलते रहे, और नीचे वाले देशों को पूरी जानकारी नहीं दी गई। बीते हफ्ते ग्लेशियर टूटा तो सैलाब ऐसे इलाके से गुजरा जहां पहले से काफी बदलाव हो चुके थे। तात्कालिक कारण प्राकृतिक रूप से बर्फ और चट्टान का गिरना लगता है। लेकिन, इतने बड़े निर्माण से पूरे इलाके का खतरा बढ़ जाता है। छोटे बदलाव भी यहां बड़ी तबाही ला सकते हैं।
पूर्व में भी यही रवैया दिखता है। चीन यारलुंग त्सांगपो पर एक बहुत बड़ा बांध बना रहा है, जो थ्री गॉर्जेस बांध से भी बड़ा होगा। उस जगह के पास सक्रिय दरार भी पाई गई है। अगर भूकंप या कोई और हादसा हुआ तो पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के बड़े हिस्से बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। नीचे वाले देशों ने चिंता जताई है, लेकिन चीन निर्माण जारी रखे हुए है और खतरों की बात को कम करके बता रहा है।
26 अगस्त की यह आपदा सिर्फ स्थानीय घटना नहीं है। यह एक साफ चेतावनी है। चीन की तेज रफ्तार वाली ऊंचाई वाली परियोजनाओं ने इस कमजोर पहाड़ी क्षेत्र में खतरा बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों और नीचे रहने वाले लोगों की चेतावनियों को कम आंककर, और अपनी महत्वाकांक्षा को प्राथमिकता देकर, चीन ने और बड़ी घटनाओं की संभावना बढ़ा दी है। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पहले से कमजोर हो रहे हैं। गलत जगह पर भारी निर्माण इस खतरे को और बढ़ा देता है।
क्षेत्रीय सरकारों, वैज्ञानिक संस्थाओं और नीचे रहने वाले लोगों को चीन की परियोजनाओं की पूरी जानकारी चाहिए। ग्लेशियर झीलों और कमजोर ढलानों की स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों में और बड़े निर्माण पर लगाम लगानी होगी। वरना, ऐसी तबाही बार-बार हो सकती है। इस हफ्ते मारे गए लोगों और उजड़े गांवों को सिर्फ प्राकृतिक हादसा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो ऐसे पहाड़ों में लिए गए जहां अस्थिरता की चेतावनी पीढ़ियों से दी जा रही है; और जिन्हें अभी भी नजरअंदाज किया जा रहा है।

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