बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

साल 2025 की आख़िरी सुबह है। सर्दियों की धुंध अब भी इंडस्ट्रियल एरिया पर छाई हुई है। जगन्नाथ अपनी छोटी-सी फैक्ट्री का शटर उठाते हैं। अंदर तेल, लोहे और पसीने की जानी-पहचानी गंध फैली है। एक तरफ़ दफ़्तर में कंप्यूटर और डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं। घर पर उनकी पत्नी रजनी ने चाय का पानी चढ़ा दिया है। टिफ़िन बांधते हुए, बच्चों के स्कूल के संदेश देखते हुए और बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल करते हुए वह धीमी आवाज़ में चल रही ख़बरें सुन रही है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, एआई और भविष्य जैसे शब्द कमरे में तैरते हुए बड़े अच्छे लगते हैं।

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अगर सियासत सिर्फ़ गिनती का खेल होती, तो भारत का विपक्ष आज सत्ता के क़िले पर चढ़ाई के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आता। लेकिन, भारतीय लोकतंत्र के सख़्त मैदान में सिर्फ़ सीटों की संख्या काफ़ी नहीं होती। यहां ज़रूरत है एक पुख़्ता यक़ीन की, आपसी एकजुटता और सरकार के सामने रखने के लिए एक दमदार, भरोसेमंद कहानी की। और, इन्हीं अहम मोर्चों पर विपक्ष बुरी तरह पिछड़ा हुआ है...

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दोपहर की तपती धूप। सड़क किनारे सरकारी पंप। फटे-कपड़ों में एक आदमी, जिसे देखने वाले ‘भिखारी टाइप’ कह सकते हैं, महीनों बाद पानी से बदन भिगो रहा है। तभी एक चमचमाती कार रुकती है। भीतर से उतरी एक संभ्रांत महिला नाक सिकोड़कर कहती है, “देखो, कितना पानी बेकार बहा रहा है!

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दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी अचानक कुछ हल्की पड़ गई, जब व्लादिमीर पुतिन का विमान उतरा और राजधानी ‘पुतिन यात्रा’ की राजनीतिक गर्माहट में नहा उठी। दिसंबर की ठिठुरन ही नहीं टूटी—भारत-रूस की पुरानी दोस्ती भी नई चमक के साथ दुनिया के सामने उभरी, जैसे भारत आत्मविश्वास के साथ वैश्विक नेतृत्व की केंद्र-पट्टी पर वापस लौट आया हो...

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क्या भारत फिर इतिहास को दोहराते हुए खामोश तमाशबीन बना रहेगा? क्या हम सचमुच बांग्लादेश को एक और पाकिस्तान में तब्दील होते देखने का इंतज़ार कर रहे हैं, उस मोड़ तक, जहां से वापसी नामुमकिन हो जाती है...

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मरोड़े हुए लोहे के ढांचे से एक-एक कर शव निकाले जा रहे हैं। कुछ ही मिनट पहले यही ढांचा हंसता-खेलता परिवार था, छुट्टियां मनाने निकला हुआ। खून से सनी सीटों के बीच एक बच्चे का जूता पड़ा है। टूटी हुई स्टीयरिंग एक बेजान जिस्म को जकड़े हुए है। कहीं खोपड़ी सीट से टकराकर चटक गई है, कहीं पलटी गाड़ी के नीचे हाथ-पैर कुचल गए हैं। यह किसी दुर्लभ या अचानक हुए हादसे की डरावनी तस्वीर नहीं है। यह भारत की सबसे तेज़ सड़कों की रोज़मर्रा की हक़ीक़त है। उत्तर प्रदेश की एक्सप्रेसवे सड़कों पर मौत अब कोई मेहमान नहीं, बल्कि रोज़ का मुसाफ़िर बन चुकी है...

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