बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट का ताज़ा फैसला कोई साधारण कानूनी टिप्पणी नहीं है। यह शासन व्यवस्था की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्वीकार किया है कि अवैध रेत खनन पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं बचा है। कानून थक चुका है। प्रशासन ने हथियार डाल दिए हैं। राजनीति ने आंखें मूंद ली हैं...

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भारत के बड़े शहर अब थक चुके हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में दम घोंटने वाला ट्रैफिक, बहुत ऊंचे किराए और सांस लेने में तकलीफ हो रही है। आम आदमी इन शहरों से परेशान है।

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जब हम जेम्स ऑगस्टस हिक्की, उस जांबाज़ आयरिश शख़्स की भावना को याद करते हैं, जिसने 29 जनवरी 1780 को भारत का पहला अख़बार ‘हिक्कीज़ बंगाल गज़ट’ शुरू किया था, तो आज की पत्रकारिता को देखकर ‘कन्फ्यूजन’ होता है, खासतौर पर डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता देखकर।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ पर उनकी कैप्स-लॉक वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियां कोई साधारण बयान नहीं हैं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं...

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हाल ही में एक ज्ञानी बाबाजी से टकराहट हुई। वह बोले "कलियुग आ चुका है, अमेरिका, यानी पश्चिम, से शुरू हुआ है, फिर मध्य एशिया, अंत में भारतीय क्षेत्र पर सौ साल में छा जाएगा। तब तक आगे बढ़ना है। नीचे गिरने से पूर्व तरक्की की बुलंदियां छूनी होती हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पश्चिमी समाज को गर्त में पहुंचाने के लिए ही अवतरित हुए हैं।" उनकी बातें सुनकर कुछ लोगों का सोया हास्य रस जाग्रत हुआ...

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भारत की हर वयस्क, गैर-पेंशनभोगी और गैर-आयकरदाता महिला को ₹5,000 मासिक ‘यूनिवर्सल बेसिक सैलरी’ देना न केवल आर्थिक रूप से पूरी तरह संभव है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और जमीनी विकास के लिए आवश्यक है। यह एक सीधी, सम्मानजनक और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था बनकर उन अनगिनत भारतीय महिलाओं को औपचारिक रूप से “कमाने वाली” की पहचान दे सकती है, जिनके श्रम ने दशकों से परिवार और समाज की रीढ़ तो संभाली, पर उन्हें कभी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिली...

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