भारतीय राजनीति का रंगमंच और उस पर विपक्षी नेताओं का जलवा, यह कहानी किसी मसाला फिल्म से कम नहीं है! कांग्रेस के ‘युवराज’ के बयान आग की तरह फैलते हैं, मगर जब सच की कसौटी पर तौले जाते हैं, तो कई बार झूठ भी शरमा जाता है...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
भारतीय राजनीति का रंगमंच और उस पर विपक्षी नेताओं का जलवा, यह कहानी किसी मसाला फिल्म से कम नहीं है! कांग्रेस के ‘युवराज’ के बयान आग की तरह फैलते हैं, मगर जब सच की कसौटी पर तौले जाते हैं, तो कई बार झूठ भी शरमा जाता है...
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क्या हमारे बेडरूम ख़ून से सने जंग के मैदान बन रहे हैं? कभी बीवियां ईंटों से शौहर का सर कुचल देती हैं, तो कहीं आशिक लाश को सीमेंट के ड्रम में छिपा देता है। हिंदुस्तान की नई मोहब्बत अब धोखे और दरिंदगी की स्क्रिप्ट बन चुकी है। हर मुस्कुराते सेल्फी वाले जोड़े के पीछे छिपी हो सकती है कोई सीक्रेट चैट, कोई भषड़ भरा ग़ुस्सा, या कोई पहले से लिखा हुआ क़त्ल का प्लान। जैसे-जैसे एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे बढ़ रहा है एक नया क्राइम ऑफ़ पैशन, जहां प्यार मरता नहीं, मार देता है...
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कल्पना कीजिए, यदि भारत ने परिवार नियोजन कार्यक्रम न अपनाया होता तो आज आबादी 250 से 300 करोड़ के बीच होती। ऐसे में भूमि, जल और खाद्य संसाधनों पर भयानक दबाव पड़ता। पहले से ही सीमित कृषि क्षेत्र का विस्तार असंभव है, जबकि जल संसाधनों के 2030 तक 50 फीसदी घटने का अनुमान है। ऐसी परिस्थिति में भूख, पलायन और अराजकता का साम्राज्य होता...
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सियासत का पारा चढ़ चुका है, हवा में नारे हैं, गलियों में जोश है और दिलों में उबाल! पटना से पूर्णिया तक, हर नुक्कड़ पर एक ही सवाल गूंज रहा है, “अबकी बार कौन?” नवंबर की ठंडी हवाओं के बीच बिहार फिर से एक गर्म रणभूमि में बदल चुका है।
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दक्षिण के एक नामी स्कूल में 16 साल की एक लड़की से शिक्षकों द्वारा की गई सामान्य पूछताछ ने डिजिटल युग का एक डरावना सच सामने ला दिया, जिससे छात्रों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की अंधेरी दुनिया उजागर हो गई।
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भारत की सुप्रीम कोर्ट को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरेदार माना जाता है। महिलाओं के अधिकार, समलैंगिक बराबरी और पर्यावरण सुरक्षा जैसे ऐतिहासिक फ़ैसलों ने अदालत की साख मज़बूत की है। लेकिन, हाल के बरसों में कई फ़ैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि अदालतें अपने दायरे से बाहर निकलकर नीति और प्रशासन का काम करने लगी हैं। न्यायिक सक्रियता पर एक बहस 1993 में भी हुई थी जब जस्टिस कुलदीप सिंह बेंच ने एमसी मेहता की याचिका पर ताज ट्रिपेजियम जोन में प्रदूषणकारी उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दी थीं...
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