बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

बीस लाख से अधिक लोगों का शहर आगरा सरकारी लापरवाही और गलत प्राथमिकताओं का जीता-जागता सबूत और असफलता की बेहतरीन मिसाल है...

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हाल ही में पहलगाम नरसंहार से जहां एक शांतिपूर्ण माहौल खूनी संघर्ष में बदल गया, वहीं इसने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच की नाजुक शांति को तोड़ दिया। इस हमले ने सैन्य प्रतिशोध की तीव्र मांगों को फिर से जगा दिया है, जो राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया पर ज़ोरदार तरीके से गूंज रहा है। पिछले एक हफ्ते में हजारों किलो मोमबत्तियां जल के बुझ चुकी हैं। नारेबाजी से तापमान वृद्धि हो चुकी है। फिर भी, युद्ध के ढोल बजने और पूर्ण शंखनाद से पहले, राष्ट्र को रुककर परिणामों पर विचार करना चाहिए।

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साल 2025 हिंदुस्तान के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है क्योंकि दक्षिण पश्चिमी मानसून अपने वक़्त से पहले ही आ चुका है। इससे मुल्कभर में बहुत ज़रूरी राहत मिलने की उम्मीद है।

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पृथ्वी से अंतरिक्ष पहुंचना आसान है परन्तु दयालबाग से फतेहाबाद रोड तक का सफर अनिश्चितताओं और विलंब से प्रभावित हो सकता है। आगरा शहर में कहीं भी सही टाइम पर पहुंचना बाधा दौड़ में भाग लेना जैसा हो गया है। क्या वाकई यातायात प्रबंधन एक ‘रॉकेट साइंस’ है, या ट्रैफिक पुलिस और यातायात विभाग के कर्ता-धर्ता इतने अक्षम या हकीकत से दूर चल रहे हैं?

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आगरा, अपने ऐतिहासिक गौरव और मनमोहक वास्तुकला के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन आज यह शहर एक गंभीर पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। पॉलीथीन, छोटी प्लास्टिक की बोतलें और 100-200 ग्राम के पाउच जैसे एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के अंधाधुंध इस्तेमाल ने शहर की जल निकासी और सीवर प्रणाली को अवरुद्ध कर दिया है। यह समस्या न केवल शहर की सुंदरता को धूमिल कर रही है, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन गई है।

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आखिरकार, आगरा शहर का सत्यानाश कौन कर रहा है? इसका जवाब यदि आपको मिल जाए तो जरूर बताएं, क्योंकि हम ‘कन्फ्यूज्ड’ हैं। काफी शहरवासियों का मत है कि एक तरफ निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की जमात है, तो दूसरी ओर सरकारी संस्थाओं के बड़े बाबुओं की फौज है जो मिलकर आगरा को ढंग से निचोड़ रहे हैं।

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