बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

आगरा, अपने पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। सालाना लाखों पर्यटकों को यह शहर आकर्षित करता है। लेकिन, बावजूद अपनी वैश्विक पहचान के, आगरा की छवि एक निहायती गंदे शहर के रूप में प्रचलित है...

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पहलगाम में हुआ आतंकी हमला, पहले की तरह इस बार भी हमारे समाज और सिस्टम की एक जानी-पहचानी, खोखली प्रतिक्रिया को सामने ले आया। मोमबत्तियां जलाना, शोक सभाएं, प्रेस बयान, मानव श्रृंखलाएं, और झंडा जलाने जैसे प्रदर्शन – ये सब अब एक रस्म बन चुकी हैं। मगर सवाल यह है कि क्या यह इज़हार-ए-ग़म एक मज़बूत और समझदार मुल्क की निशानी हैं...

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शशि थरूर ने ट्रंप के बारे में जो टिप्पणी की, और एप्पल कंपनी को भारत से निकलने की सलाह देकर ट्रंप ने अमेरिका की इमेज को जितना नुकसान किया है वो निक्सन और क्लिंटन के विवादित कार्यकालों से सौ गुना ज्यादा बताया जा रहा है।

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जब भारत चारों ओर से असहज और शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से घिरा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छोटे, संसाधनहीन राष्ट्रों का कोई भविष्य बचा है? या वे हमेशा के लिए वैश्विक ‘बास्केट केस’ बनकर रह जाएंगे। खासकर, वे देश जो गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी सहायता पर निर्भरता के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं, और कट्टरवाद के टापू बने हुए हैं...

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22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो हुआ, वह सिर्फ आतंकवाद नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा पर एक सोची-समझी चोट थी...

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क्या आपने कभी सोचा है कि हम कब से चीज़ों को सुधारने के बजाय फेंकना ज़्यादा पसंद करने लगे हैं? एक ज़माना था जब एक टूटी कुर्सी को ठीक किया जाता था, फटे कपड़ों को सिला जाता था और रिश्तों की डोर को गांठ लगाकर मज़बूत किया जाता था। लेकिन, आज की भागदौड़ भरी आधुनिक ज़िंदगी में 'यूज़ एंड थ्रो', यानी इस्तेमाल करो और फेंको, की मानसिकता सिर्फ़ बाज़ार के सामान तक सीमित नहीं रही, बल्कि ये हमारे पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी गहरी पैठ बना चुकी है।

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