अगर कोई कहे कि नदी किनारे बसा शहर प्यासा मर सकता है, तो शायद लोग हंस पड़ें। लेकिन, आगरा की कहानी मज़ाक नहीं, एक कड़वी हक़ीक़त है।
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
अगर कोई कहे कि नदी किनारे बसा शहर प्यासा मर सकता है, तो शायद लोग हंस पड़ें। लेकिन, आगरा की कहानी मज़ाक नहीं, एक कड़वी हक़ीक़त है।
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मार्च 2020 की वह काली रात याद है? सन्नाटा चीरती एंबुलेंस की चीखें। वीरान सड़कें, बंद हवाई अड्डे, ताले लगे स्कूल, अस्पतालों के बाहर मौत का इंतज़ार करती कतारें। एक खांसी डर बन जाती थी, एक छींक आफत। लोग अपने ही घरों में क़ैद थे, परिवार दूर, डॉक्टर-नर्स टूटते जा रहे थे। कई लोग अपनों को आखिरी बार छू भी नहीं सके।
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जयति जयति भारत माता! कितना सरल, कितना मधुर और कितना भारतीय उद्घोष है। फिर सवाल उठता है, आज़ादी के बाद जब देश अपनी नई पहचान तलाश रहा था, तब ऐसा सुंदर संस्कृत गीत राष्ट्रीय मंच तक क्यों नहीं पहुंच पाया...
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त्योहार खुशियां लाते हैं। वे लोगों को जोड़ते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं। लेकिन, जब भक्ति का वॉल्यूम इतना बढ़ जाए कि पूरा मोहल्ला परेशान हो जाए, तो सवाल उठना लाज़िमी है...
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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा, “हम कॉकरोच हैं!” चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है कि हवा किस तरफ है?
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एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब सिर्फ दूरदर्शन होता था। एक चैनल, एक आवाज़, एक शाम। रिमोट का आतंक नहीं, मोबाइल की घंटी नहीं, रील-शॉर्ट नाम की कोई आफ़त नहीं। पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठता था; कभी फर्श पर, कभी सोफे पर, और जब विज्ञापन भी आता तो कोई पानी लेने भी नहीं उठता था। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे...
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