बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

नई दिल्ली का जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।

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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ। कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। और, उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया...

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आख़िर नालियां किसने खोलीं? हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है। रोशनी मंद पड़ती है। कैमरे बंद हो जाते हैं। दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं कोई मुस्कुराता है। मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है। और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है, "फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म हो गया है!"

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घर में अजीब-सी ख़ामोशी है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ रहा है। यादें धुंधली पड़ रही हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन रही है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहां हर पांचवां नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग हो जाएगा।

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सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है...

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तीन विश्व धरोहर स्मारक और लगभग आधा दर्जन अलग आकर्षणों को अपनी गोद में रखे आगरा शहर एक अजीब उलझन में फंसा दिखता है। यह शहर न तो हेरिटेज सिटी बन पाया और न ही स्मार्ट सिटी, आज आगरा की पहचान ‘जाम नगरी’ की बन चुकी है...

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