बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार-बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है...

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​26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊंचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबे ने नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।

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देश भ्रमण के अनेक फायदे हैं। कूपमंडूकता और कई दृष्टि-भ्रम रास्ते में ही टूट जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम निकलें, तो बहुत से पूर्वाग्रह अपने आप ध्वस्त होते चलते हैं...

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मास कम्युनिकेशन में इसे सहभागी संचार की दृष्टि से देखा जा सकता है। मोदी की संचार शैली केवल तत्काल संकटों तक सीमित नहीं रही। बाद में यही तकनीक दीर्घकालीन लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल हुई।

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कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी। एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब! पर दोनों सरकारी जवाब थे...

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कैमरा घूमता है। पर्दे पर एक भव्य हवेली दिखाई देती है। मोटे-से सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे हैं। आसपास बही-खाते, तिजोरियां और रुपयों के बक्से रखे हैं। पास में पुराने हिन्दी सिनेमा के परिचित मुनीमजी खड़े हैं, एक्टर कन्हैया लाल, चेहरे पर चालाक मुस्कान और हाथ में मोटा हिसाब-किताब...

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