कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।
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