जयति जयति भारत माता! कितना सरल, कितना मधुर और कितना भारतीय उद्घोष है। फिर सवाल उठता है, आज़ादी के बाद जब देश अपनी नई पहचान तलाश रहा था, तब ऐसा सुंदर संस्कृत गीत राष्ट्रीय मंच तक क्यों नहीं पहुंच पाया?
यह गीत दक्षिण भारत के महान कर्नाटक संगीतकार मयूरम विश्वनाथ शास्त्री (1893–1958) ने रचा था। आजादी के आसपास उन्होंने भारत माता और महात्मा गांधी की प्रशंसा में संस्कृत गीतों का संग्रह भारत भजन तैयार किया था जिसमें 18 गीत थे।
Read in English: Song that echoed across South India, but never became ‘National Song’
‘जयति जयति भारत माता’ उन्हीं गीतों में से एक था। इसकी धुन राग खमास में है। शब्द सरल हैं और भाव बहुत व्यापक है। भारत माता सभी की माता हैं। वह किसी जाति, भाषा या क्षेत्र में भेद नहीं करतीं। वह सज्जनों की रक्षा करती हैं और गिरे हुए लोगों को भी अपनाती हैं। यानी आज के भारत की 'एकता में अनेकता' वाली भावना इसमें खूब दिखाई देती है। फिर यह गीत राष्ट्रगान क्यों नहीं बना?
यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। आज़ादी के बाद राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ। अंततः ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाया गया और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का सम्मान मिला। दोनों के पीछे लंबा स्वतंत्रता आंदोलन था। ‘जन गण मन’ को देशभर में पहचान मिल चुकी थी। ‘वंदे मातरम्’ तो आजादी की लड़ाई का जोशीला नारा बन चुका था। ‘जयति जयति भारत माता’ की स्थिति अलग थी। यह अपेक्षाकृत नया गीत था। इसका प्रसार मुख्यतः दक्षिण भारत और कर्नाटक संगीत की दुनिया में था। दिल्ली की राजनीतिक गलियों में इसकी उतनी पहुंच नहीं थी। लेकिन, यहीं एक सवाल पैदा होता है।
क्या आजादी के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व, नेहरू सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं को भारत की दूसरी भाषाई और संगीत परंपराओं को राष्ट्रीय मंच देने की ज्यादा कोशिश नहीं करनी चाहिए थी?
नेहरू और उस दौर के नेताओं के सामने एक विशाल और जटिल देश था। राष्ट्रगान चुनना कोई संगीत प्रतियोगिता नहीं थी। उसमें इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, सामूहिक स्वीकार्यता और सरकारी समारोहों में प्रस्तुति जैसे कई सवाल जुड़े थे। फिर भी, दक्षिण भारत से आए इस संस्कृत गीत को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रचार क्यों नहीं मिला, यह सवाल पूछने में कोई हर्ज नहीं है।
संस्कृत होने का भी सवाल है। संस्कृत भारत की प्राचीन भाषा है। वह उत्तर की भी है और दक्षिण की भी। मंदिरों, दर्शन, साहित्य और शास्त्रीय संगीत की विशाल परंपरा उससे जुड़ी है। फिर भी आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की राजनीति में भाषा का सवाल बेहद संवेदनशील था। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था।
ऐसे माहौल में संस्कृत के किसी गीत को राष्ट्रीय प्रतीक बनाना शायद राजनीतिक रूप से आसान विकल्प नहीं माना गया। लेकिन अगर ऐसा था, तो सवाल और बड़ा हो जाता है कि क्या भारत की प्राचीन भाषाई विरासत को राजनीति के डर से पीछे कर दिया गया?
इसका सीधा दोष केवल जवाहरलाल नेहरू पर डालना इतिहास को कुछ ज्यादा सरल बना देना होगा। लेकिन नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि उन्होंने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय मंच पर लाने के लिए कितना प्रयास किया। गीत बच गया, लेकिन इतिहास की किताब में नहीं आया। दिलचस्प बात यह है कि जयति जयति भारत माता, मरा नहीं। दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत जगत ने इसे अपने दिल में बचाए रखा।
महान गायक जीएन बालसुब्रमण्यम, जिन्हें संगीत की दुनिया में असाधारण स्थान प्राप्त था, ने इसे गाया। मदुरै मणि अय्यर और दूसरे कलाकारों ने भी इसे लोकप्रिय बनाया। आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह गीत सुनाई देता है। लेकिन, राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान अभी भी सीमित है।
भारत में अक्सर ऐसा होता है। दिल्ली में जो गूंजता है, वह पूरे देश का गीत बन जाता है। जो चेन्नई, मैसूर, तंजावुर या मदुरै में गूंजता है, उसे 'क्षेत्रीय' कहकर छोड़ दिया जाता है। शायद, यही इस गीत की सबसे बड़ी विडंबना है। भारत माता की स्तुति संस्कृत में हुई, धुन दक्षिण भारत से आई, भाव पूरे भारत का था, लेकिन राष्ट्रीय मंच ने उसे पूरी तरह अपना नहीं पाया।
आज, आजादी के इतने वर्षों बाद, इस गीत को फिर से सुनने की जरूरत है। राष्ट्रगान बदलने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रीय गीत की गरिमा भी अपनी जगह है। लेकिन, भारत की सांस्कृतिक विरासत कोई सरकारी फाइल नहीं है, जिसमें केवल दो-चार नाम दर्ज हों।
भारत माता के गीत जितने ज्यादा होंगे, भारत की आवाज उतनी ही समृद्ध होगी। और शायद आज फिर कोई पूछ सकता है कि ‘जयति जयति भारत माता’ तो तब भी थीं, आज भी हैं। फिर हमने उनकी यह आवाज इतनी देर से क्यों सुनी?
इस गीत की सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें भारत माता को किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र की माता नहीं, बल्कि सभी की माता के रूप में देखा गया है। समानता, करुणा, प्रकृति-प्रेम, सद्गुण और अखंडता इसके प्रमुख भाव हैं। और, शायद यही बात इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है कि भारत की कल्पना केवल एक भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक करुणामयी और सबको साथ लेकर चलने वाली माता के रूप में की गई है।

बृज खंडेलवाल





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