बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।

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सुबह की पहली किरण ताज महल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है...

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सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, "Hi, how are you?" दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, "I am fine, thank you." तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, "Where is your project ?" उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर सपने बड़े हैं…

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अस्पताल का दरवाज़ा खुलते ही हर इंसान अपनी जान डॉक्टर के हवाले कर देता है। उसे यक़ीन होता है कि अब उसकी ज़िंदगी महफ़ूज़ है। लेकिन, जब वही अस्पताल उम्मीद की जगह मातम का घर बन जाए, तो सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या इलाज अब इंसानियत का फ़र्ज़ रह गया है, या सिर्फ़ मुनाफ़े का धंधा बनता जा रहा है...

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देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन, इसी बीच, कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक ‘मधुरिमा’ ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी...

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मीडिया की दुनिया की आज सबसे बड़ी खबर यही है कि खबर अब खबर नहीं रही है। वह एक उत्पाद बन गई है; बिकती है, पैक होकर आती है, सजती-संवरती है, चमकती है, और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

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