बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

सेवा के काम में शोर नहीं, असर होना चाहिए। लेकिन, आज के समय में असर से पहले पोस्ट आ जाती है। गौर से देखें, समाजसेवा भी कुछ-कुछ क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। सबकी नज़र स्कोरबोर्ड पर है; किसने सबसे पहले ट्वीट किया? किसने फेसबुक पर ‘ब्रेकिंग’ डाली? किसने फोटो के साथ लिखा; “मेरे प्रयासों से…”

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एक व्यस्त चौराहा। लाल बत्ती जलती है। इंजन रुकते हैं। एसी की ठंडी हवा के भीतर बैठे लोग मोबाइल देखने लगते हैं। और तभी हीरा आ जाती है। चमकीली साड़ी। सलीके से बंधे बाल। होंठों पर गाढ़ी लिपस्टिक। आंखों में तेज। उम्र कम, हौसला बड़ा। वह अपनी खास, पहचानी हुई ताली बजाती है। शीशे पर हल्की दस्तक देती है। मुस्कराकर कहती है, “खुश रहो बाबू… तरक्की करो…”।

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जब एक आम आदमी किसी मुसीबत में थाने की ओर बढ़ता है, तो क्या उसके कदमों में भरोसा होता है या दिल में खौफ़? यही सवाल आज लोकतंत्र के आईने में पुलिस की छवि को देखता हुआ खड़ा है...

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में एक बुनियादी सच्चाई को दोहराया है, “भारत की तक़दीर उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त से तय होगी, दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से नहीं। आज की बदलती दुनिया में, उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर दिया है, एक ऐसा भारत जो हिंद महासागर को सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक ज़रूरी हिस्सा मानता है।"

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एक "लाइक" के लिए कितने और बच्चे मरने चाहिए? यह सवाल दिल दहला देने वाला है। लेकिन, भारत को इसका सामना करना पड़ेगा। 

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बीती पहली तारीख की तपती दोपहर में मदुरै की ज़मीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सियासी बिजली की तरह उतरे। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने एनडीए में नई जान फूंक दी। विकास, भक्ति और तीखे बयान, तीनों का ज़बर्दस्त संगम दिखा। मकसद साफ था। डीएमके के लंबे क़ब्ज़े को चुनौती देना...

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