देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन, इसी बीच, कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक ‘मधुरिमा’ ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी।
मामला मोहनजोदड़ो की विश्वप्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ कांस्य प्रतिमा का है। यह साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है। वर्षों से यह अपने मूल स्वरूप में पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित होती रही, लेकिन इस बार इसके धड़ पर डिजिटल छाया डालकर उसे ढक दिया गया। इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया। बढ़ते विवाद के बाद एनसीईआरटी ने मूल चित्र बहाल करने का फैसला लिया।
अंग्रेजी में पढ़ें : ‘Dancing Girl’ from Mohenjo‑daro: Are we ashamed of our history…!
इतिहासकार ने कहा, “यह एक काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा है। माइकलएंजेलो की डेविड प्रतिमा पर गिरजाघर द्वारा अंजीर का पत्ता चिपकाने जैसा।” यह टिप्पणी केवल एक उपमा नहीं थी। उसने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया।
यह केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच का सवाल है जो इतिहास को उसकी असल शक्ल में देखने से हिचकती है। अगर किसी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के नैतिक चश्मे से बदलना शुरू कर दिया जाए, तो कल किसी मूर्ति का हाथ, किसी चित्र का चेहरा या किसी शिलालेख की पंक्तियां भी बदली जा सकती हैं। तब इतिहास तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सुविधानुसार गढ़ी गई कहानी बन जाएगा।
दुनिया का अनुभव भी यही बताता है। यूरोप में कभी अनेक मूर्तियों और चित्रों को नैतिकता के नाम पर ढक दिया गया था। बाद में विद्वानों ने माना कि इससे कला और इतिहास दोनों के साथ अन्याय हुआ। संग्रहालयों ने मूल स्वरूप को फिर से अपनाया और यह स्वीकार किया कि इतिहास को बदलने के बजाय उसे समझाना ही बेहतर रास्ता है।
स्कूल की किताबों में बच्चों की उम्र और संवेदनशीलता का ध्यान रखना निश्चित रूप से ज़रूरी है। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं कि प्रामाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं को ही बदल दिया जाए। अगर किसी कलाकृति के बारे में अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है, तो वह पाठ, टिप्पणी या शिक्षक के माध्यम से दी जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य सच से परिचित कराना है, सच पर पर्दा डालना नहीं।
एक प्रमुख अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम को ‘इतिहास पर फ़ोटोशॉप’ कहा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल तस्वीर नहीं बदलता, बल्कि देखने वाले की समझ भी बदल देता है। विद्यार्थी वही सच मानते हैं जो उनकी पाठ्यपुस्तक में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में तथ्य और प्रमाणिकता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
भारतीय सभ्यता ने मानव शरीर को कभी शर्म का विषय नहीं माना। मंदिर और उनकी भित्तिचित्र कला तथा मूर्तियां इसी सोच की गवाह हैं। इनमें शरीर को वासना नहीं, बल्कि जीवन, सौंदर्य, सृजन और प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी खूबी रही है।
विडंबना यह है कि हम दुनियाभर में योग, आयुर्वेद और अपनी प्राचीन सभ्यता पर फ़ख्र करते हैं, लेकिन उसी विरासत की कलात्मक अभिव्यक्तियों को देखकर असहज हो जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।
एक इतिहासकार ने सही कहा, “अगर नृत्यांगना को अपनी असली शक्ल में नहीं दिखाया जा सकता, तो भारतीय कला का अध्ययन कैसे होगा?” यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास बोध का है।
पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों की सोच, समझ और दृष्टि का निर्माण करती हैं। अधूरा या संशोधित इतिहास अंततः अधूरी समझ ही पैदा करता है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसमें आत्मविश्वास था, जिज्ञासा थी और सच का सामना करने का साहस था।
इसलिए, इतिहास को अंजीर के पत्ते से ढकने के बजाय उसकी मूल गरिमा के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक आवश्यक है। सच से आंखें चुराने वाली शिक्षा कभी आत्मविश्वासी समाज का निर्माण नहीं कर सकती।

बृज खंडेलवाल





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