सुबह की पहली किरण ताज महल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है।
कहीं आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों का पीछा करते हैं। कहीं बंदर छतों और बालकनियों पर नज़र गड़ाए बैठे रहते हैं। यमुना किनारा रोड पर भैंसों और गायों के झुंड सड़क को अपना चारागाह समझ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो शहर की सड़कें अब इंसानों की नहीं रहीं।
ताज महल के कारण दुनियाभर में पहचान रखने वाले इस शहर के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक संकट बन चुका है। अस्पतालों, वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और सुबह टहलने वालों के लिए हर दिन एक नई परीक्षा बन गया है।
सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि आगरा में 90 हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग 60 हजार पालतू कुत्ते हैं। हर दिन करीब 300 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। यह संख्या कई बड़े महानगरों से भी अधिक है।
दिल्ली जैसे विशाल शहर में छह महीने के दौरान जितने डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने मामले कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। यह तुलना बताती है कि ताज नगरी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।
गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि उनके पास आने वाले अधिकांश पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। कई बच्चे खेलते समय या कुत्तों को खाना खिलाते हुए घायल हो जाते हैं। निजी क्लीनिकों में ही रोज़ सौ से अधिक मरीज पहुंचते हैं। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग से भारी दबाव रहता है।
नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि मौजूदा संसाधनों से इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करना आसान नहीं है। अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार समस्या के मुकाबले बहुत धीमी है।
इसी कारण अब पूरे शहर में बड़े स्तर पर नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम किसी निजी एजेंसी को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन लोगों का सवाल है कि जब वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी हालात क्यों नहीं बदले?
मुसीबत केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। मंदिरों, बाजारों और ताज महल के आसपास बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। वे बच्चों के हाथ से टिफिन छीन लेते हैं, बुजुर्गों के चश्मे और मोबाइल उठा ले जाते हैं। कई पर्यटक भी उनका शिकार बन चुके हैं।
उधर, यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से लौटते भैंसों और गायों के झुंड पूरी सड़क घेर लेते हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन किसी तरह रास्ता निकालते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं। रात का समय सबसे खतरनाक होता है। अंधेरे में काले रंग के मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देते। बाइक सवार अक्सर उनसे टकरा जाते हैं। कई हादसों में लोगों को गंभीर चोटें भी आई हैं।
जो पार्क कभी बुजुर्गों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजते थे, वहां अब डर का माहौल है। सुबह की सैर करने वाले लोग बताते हैं कि कुत्तों के झुंड उनका पीछा करते हैं। कई लोगों ने अपनी सैर का समय घटा दिया है। माता-पिता अब छोटे बच्चों को अकेले बाहर खेलने भेजने से घबराते हैं। स्कूल जाते समय भी बच्चों के साथ किसी बड़े का होना ज़रूरी समझा जाने लगा है।
देश के कई शहरों में आवारा जानवरों की समस्या बढ़ रही है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि नागरिकों को बिना भय के सार्वजनिक स्थानों पर चलने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय की।
रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि आगरा केवल स्थानीय लोगों का शहर नहीं, बल्कि करोड़ों पर्यटकों की मंज़िल भी है। यदि सड़कों पर असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो शहर की छवि और पर्यटन, दोनों प्रभावित होंगे।
समाधान आधे-अधूरे उपायों से नहीं निकलेगा। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण, छोड़े गए मवेशियों के पुनर्वास, बंदरों के वैज्ञानिक प्रबंधन और लापरवाह पशु मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।
जब तक ऐसा नहीं होता, ताज नगरी के लोग हर सुबह घर से निकलते समय पहले सड़क पर नज़र डालेंगे और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी सभ्य शहर के लिए इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है?

बृज खंडेलवाल





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