अगर ताज महल एक सुबह खामोश हो जाए, तो क्या आगरा भी चुप पड़ जाएगा? जवाब है “नहीं”। तब शायद पहली बार यह शहर अपनी असली आवाज़ में बोलेगा, कारीगरों की हथौड़ी की टन-टन, बाजारों का मोल-भाव, हलवाइयों की कड़ाही की खुशबू और शायरों की नज़्मों के बीच। ताज महल आगरा का ताज है, लेकिन आगरा सिर्फ ताज नहीं, यह एक चलती-फिरती सभ्यता है...
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