बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन, इसी बीच, कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक ‘मधुरिमा’ ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी...

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मीडिया की दुनिया की आज सबसे बड़ी खबर यही है कि खबर अब खबर नहीं रही है। वह एक उत्पाद बन गई है; बिकती है, पैक होकर आती है, सजती-संवरती है, चमकती है, और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

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ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहां हर नागरिक सरकार की हर बात पर "जी हुज़ूर" कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएं। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएं। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूंजे; "वाह सरकार, कमाल कर दिया...

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भीषण गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। मानसून की बेरुखी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। यमुना नदी महीनों से सूखी और प्रदूषित पड़ी है। कई घाटों पर पानी की जगह रेत और गंदगी दिखाई देती है। भूजल लगातार नीचे जा रहा है। ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो ताज महल का शहर प्यास, गर्मी और जल संकट की त्रासदी से जूझने को मजबूर हो जाएगा।

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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है...

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आह, गर्मी की छुट्टियां! यह वाक्य कभी आज़ादी की महक लेकर आता था। तीस-चालीस साल पहले भारत में पले-बढ़े बच्चों के लिए गर्मी की छुट्टियां कैलेंडर की तारीख़ नहीं, साल का सबसे बड़ा उत्सव होती थीं। स्कूल की आख़िरी घंटी बजते ही लगता था, मानो जेल का फाटक खुल गया हो। वे भी क्या दिन थे...

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