बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

जब एक आम आदमी किसी मुसीबत में थाने की ओर बढ़ता है, तो क्या उसके कदमों में भरोसा होता है या दिल में खौफ़? यही सवाल आज लोकतंत्र के आईने में पुलिस की छवि को देखता हुआ खड़ा है...

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में एक बुनियादी सच्चाई को दोहराया है, “भारत की तक़दीर उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त से तय होगी, दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से नहीं। आज की बदलती दुनिया में, उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर दिया है, एक ऐसा भारत जो हिंद महासागर को सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक ज़रूरी हिस्सा मानता है।"

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एक "लाइक" के लिए कितने और बच्चे मरने चाहिए? यह सवाल दिल दहला देने वाला है। लेकिन, भारत को इसका सामना करना पड़ेगा। 

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बीती पहली तारीख की तपती दोपहर में मदुरै की ज़मीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सियासी बिजली की तरह उतरे। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने एनडीए में नई जान फूंक दी। विकास, भक्ति और तीखे बयान, तीनों का ज़बर्दस्त संगम दिखा। मकसद साफ था। डीएमके के लंबे क़ब्ज़े को चुनौती देना...

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आगरा दुनियाभर में ताज महल की बेमिसाल ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है। रोज़ हज़ारों सैलानी संगमरमर में तराशी मोहब्बत का दीदार करने आते हैं। लेकिन, पर्यटकों की चहल-पहल से ज़रा हटकर, एक और कारोबार चुपचाप फल-फूल रहा है; नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक लैब, निजी अस्पताल और दवा मार्केट नेटवर्क...

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आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के आसपास या यमुना किनारा रोड पर आपने छोटे-छोटे बच्चों को कबाड़ा प्लास्टिक बीनते जरूर देखा होगा। हर कुछ मिनट बाद वे कपड़े में भिगोया गया कोई केमिकल सूंघते हैं, जैसे वही उनकी भूख हो, वही उनका सुकून। शहर के नामी स्कूलों के इर्द-गिर्द ‘पुड़िया गैंग’ की फुसफुसाहटें हैं। शादी हो या बर्थडे पार्टी, बीयर और दारू अब रिवाज़ बन चुके हैं। कोई खांसी का सिरप गटक रहा है, कोई जर्दा, टिंक्चर या सुलोचन की बोतल। तन-बदन बेहाल, आंखें सूनी, दिमाग खिसका या भटका हुआ, नालियों और कूड़े के ढेरों में भविष्य तलाशती यह पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है?

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