बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

पिछले हफ्ते मॉर्निंग वॉक पर अचानक भाटिया जी से मुलाक़ात हो गई। उम्र ढल चुकी थी, चाल में ठहराव था, और आंखों में एक अजीब-सी राहत। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला, 42 साल बाद उन्होंने हमेशा के लिए बोरिया-बिस्तर बांध लिया और अमेरिका को अलविदा कह दिया। वजह बस इतनी थी कि अपनी जीवन संध्या में, उनको अपने शहर की मिट्टी की खुशबू ने वापस खींच लिया...

Read More

क्यों ठंडा पड़ गया वह जोश? जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में अमन का वादा करता था, उनके पास दूसरे साल में ही अल्फ़ाज़ क्यों कम पड़ गए? क्या शोर-शराबा ही नीति था, अकड़ को ही कूटनीति समझ लिया गया, या बिना नक़्शे की तोड़-फोड़ ही सब कुछ थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दुनिया अब प्रभावित होना बंद कर चुकी है...

Read More

साल 2025 की आख़िरी सुबह है। सर्दियों की धुंध अब भी इंडस्ट्रियल एरिया पर छाई हुई है। जगन्नाथ अपनी छोटी-सी फैक्ट्री का शटर उठाते हैं। अंदर तेल, लोहे और पसीने की जानी-पहचानी गंध फैली है। एक तरफ़ दफ़्तर में कंप्यूटर और डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं। घर पर उनकी पत्नी रजनी ने चाय का पानी चढ़ा दिया है। टिफ़िन बांधते हुए, बच्चों के स्कूल के संदेश देखते हुए और बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल करते हुए वह धीमी आवाज़ में चल रही ख़बरें सुन रही है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, एआई और भविष्य जैसे शब्द कमरे में तैरते हुए बड़े अच्छे लगते हैं।

Read More

अगर सियासत सिर्फ़ गिनती का खेल होती, तो भारत का विपक्ष आज सत्ता के क़िले पर चढ़ाई के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आता। लेकिन, भारतीय लोकतंत्र के सख़्त मैदान में सिर्फ़ सीटों की संख्या काफ़ी नहीं होती। यहां ज़रूरत है एक पुख़्ता यक़ीन की, आपसी एकजुटता और सरकार के सामने रखने के लिए एक दमदार, भरोसेमंद कहानी की। और, इन्हीं अहम मोर्चों पर विपक्ष बुरी तरह पिछड़ा हुआ है...

Read More

दोपहर की तपती धूप। सड़क किनारे सरकारी पंप। फटे-कपड़ों में एक आदमी, जिसे देखने वाले ‘भिखारी टाइप’ कह सकते हैं, महीनों बाद पानी से बदन भिगो रहा है। तभी एक चमचमाती कार रुकती है। भीतर से उतरी एक संभ्रांत महिला नाक सिकोड़कर कहती है, “देखो, कितना पानी बेकार बहा रहा है!

Read More

दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी अचानक कुछ हल्की पड़ गई, जब व्लादिमीर पुतिन का विमान उतरा और राजधानी ‘पुतिन यात्रा’ की राजनीतिक गर्माहट में नहा उठी। दिसंबर की ठिठुरन ही नहीं टूटी—भारत-रूस की पुरानी दोस्ती भी नई चमक के साथ दुनिया के सामने उभरी, जैसे भारत आत्मविश्वास के साथ वैश्विक नेतृत्व की केंद्र-पट्टी पर वापस लौट आया हो...

Read More



Mediabharti