बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, अपनी अव्यवस्था और उलझनों के बावजूद, अमेरिका की सख्त और कुछ हद तक जड़ प्रणाली से ज्यादा जवाबदेह और नुमाइंदगी करने वाला है...

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बीते 9 अप्रैल को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने ‘आरोग्य वन’ पहल शुरू की। राजमार्गों के किनारे अब औषधीय पेड़ों के जंगल उगेंगे। सफ़र होगा, और साथ में सेहत का पैग़ाम भी मिलेगा। सड़कें दौड़ती थीं। अब पेड़ भी साथ दौड़ेंगे। हवा में सिर्फ़ धूल नहीं, शिफ़ा की ख़ुशबू भी होगी। अब ज़रा पीछे चलते हैं।

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ईरान कितने दिन तक टिकेगा? पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ, क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते। हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।

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फारस की खाड़ी का आसमान अब नीला नहीं रहा है। धुएं से सना, बैंगनी और बोझिल दिखता है। चालीस दिन तक चली जंग ने ज़मीन ही नहीं, फिज़ा को भी ज़ख़्मी कर दिया है।

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प्यार अंधा होता है, यह कहावत पुरानी है। पर अब प्यार खून भी करने लगा है, यह नया सच है। आगरा की एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी ही मासूम बच्ची को मार डाला। वजह गुस्सा नहीं थी, गरीबी नहीं थी। वजह था एक नया रिश्ता। बच्ची “रास्ते की दीवार” बन गई थी। सवाल सीधा है। क्या अब रिश्ते बोझ बनते जा रहे हैं...

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कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव। फिल्मी अंदाज़ में, “प्यार किया तो डरना क्या!” लड़का-लड़की भागकर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे। ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद। मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती थी। पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी। अब तस्वीर बदल गई है।

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