बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

ज़रा जाड़े की उस सुबह की कल्पना कीजिए, धुंध इतनी गाढ़ी कि ताज महल का सफ़ेद संगमरमर भी भूत-सा दिखने लगे। हवा में ऐसी सड़ांध कि सांस लेते ही सीने में जलन हो और ठीक ताज के पीछ, यमुना नदी, जिसने कभी मुग़लों का इतिहास देखा, आज ज़हरीले झाग का उबलता कब्रिस्तान बन चुकी है। ऐसा लगता है मानो ताज महल अपनी ही धीमी मौत का मातम मना रहा हो।

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एक तंग-सी कोठरी में 28 साल के रमेश की अम्मा आज भी शाम होते ही उसके स्कूटर की आहट सुनने को बेचैन रहती हैं। बस 11 महीने पहले उसकी शादी हुई थी। दीवारों पर अब भी वही चमकदार, कुछ हद तक दिखावटी शादी के फ़ोटोग्राफ़ मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन उन तस्वीरों का वह नौजवान अब कहीं नहीं है। उसकी मौत ‘शादी से जुड़े मसले’ के तहत दर्ज हुई, एक ऐसा चौंकाने वाला तथ्य जिसमें 2023 में पहली बार मर्दों की खुदकुशियाँ औरतों से ज़्यादा हुईं।

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18 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक खामोश लेकिन बोल्ड फैसले में, वह दरवाज़ा फिर खोल दिया जिसे उसने पहले पूरी ताक़त से बंद कर दिया था। जो काम पहले ग़ैर-क़ानूनी कहा गया था, उसे अब अपवाद बना दिया गया है। असल में कोर्ट ने सिर्फ़ क़ानून की व्याख्या नहीं बदली, उसने जवाबदेही का मायना बदल दिया। एक मुल्क जहां हवा ज़हरीली, नदियां बीमार और जंगल ग़ायब हो रहे हों, वहां यह फैसला क़ानूनी उलझन नहीं बल्कि एक खतरे का संकेत हो सकता है।

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आगरा की हवा में आज सिर्फ़ धूल ही नहीं बल्कि एक सुलगता हुआ सवाल भी घुला हुआ है। क्या जीवनयापन की ज़रूरत, जीवन की गुणवत्ता से ऊपर है? एक तरफ़ वे आवाज़ें हैं जो चीख़-चीख़ कर कहती हैं कि "बिना उद्योग के पेट नहीं भरता।" दूसरी ओर वे चिंतित फुसफुसाहटें जो कहती हैं कि "बिना ताज के पहचान मिट जाएगी।" यह टकराव अब सुप्रीम कोर्ट की शानदार इमारत तक पहुंच चुका है, जहां तर्कों की तलवारें भिड़ रही हैं। और, इन सबके बीच, ताज महल मौन, सफ़ेद पत्थर का एक विशाल सवाल बनकर खड़ा है, जिसका जवाब आगरा की धूल-धूसरित हवा में तैर रहा है...

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जब बिहार जैसे राज्यों में हाल के विधानसभा चुनावों में रोज़गार, पलायन और गांवों की जिंदगी बड़े मुद्दे बनकर उभरे, तो यह साफ़ दिखा कि मनरेगा जैसी योजनाएं सिर्फ विकास-रिपोर्ट का हिस्सा नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक बहस की धुरी भी बन गई हैं। राज्य की दो-तिहाई से अधिक घरों पर बाहरी मज़दूरी का निर्भरता होने के बावजूद, पलायन को रोकने वाली नीतियां मतदाताओं की प्राथमिकता बनीं। जो दल गांव की ज़मीन से कटे दिखते हैं, उन्हें नतीजों में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा की ठोस बात करने वाली राजनीति को नया सहारा मिलता है।

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पश्चिमी दुनिया की राजनीति एक रंगमंच बन चुकी है, जहां लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर साम्राज्यवाद का नंगा नाच होता है। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले खुद युद्ध के सौदागर हैं। कहते हैं शांति, करते हैं तबाही, और परिणाम होता है एक डील, फायदे का सौदा। क्या यही है सभ्यता का पश्चिमी मॉडल — झूठ, छल और पाखंड का गठबंधन…?

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