खबर क्या है? जो अभी हुआ? या जो हमें भीतर तक हिला दे? आज हर जेब में न्यूज़रूम है। हर हाथ में मोबाइल। हर स्क्रीन पर ब्रेकिंग। सूचनाओं की बाढ़ है। आवाज़ों का शोर है। लेकिन सच? वह अक्सर इस कोलाहल में दब जाता है...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।
खबर क्या है? जो अभी हुआ? या जो हमें भीतर तक हिला दे? आज हर जेब में न्यूज़रूम है। हर हाथ में मोबाइल। हर स्क्रीन पर ब्रेकिंग। सूचनाओं की बाढ़ है। आवाज़ों का शोर है। लेकिन सच? वह अक्सर इस कोलाहल में दब जाता है...
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हवा का मिज़ाज बदल रहा है। रंग भी। गलियों से लेकर गलीचों तक, चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक, एक हल्की-सी केसरिया आभा तैरती नजर आ रही है। सवाल यह नहीं कि हवा चल रही है या नहीं। सवाल यह है कि यह हवा किस दिशा में बह रही है, और किसे अपने साथ उड़ा ले जाएगी...
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अहा, आनंद लें असली भारतीय पल का! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट।
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क्या हमारी नदियां अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?
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अब मौसम भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा। सचमुच आसमान ने अपनी ज़ुबान बदल ली है। मौसम अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमने बचपन में जाना था। कभी हल्की-फुल्की बारिश होती थी, अब वही आफ़त बनकर टूट पड़ती है। कभी गर्मी बस तपिश देती थी, आज वही जानलेवा लू बन जाती है...
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सुबह अगर आंख खुलते ही जलन हो, जैसे किसी ने मिर्ची का स्प्रे मार दिया हो, गले में खराश चिपक जाए मानो कोई पुराना कर्ज़ वसूल करने आ गया हो, और फेफड़े ऐसे खांसें जैसे ईएमआई की आखिरी किस्त पर डिफॉल्ट हो गया हो, तो घबराइए मत! बधाई हो, आप ‘विकास-प्रदत्त ऑक्सीजन’ का मजा ले रहे हैं। गहरी सांस लीजिए, ये बदबू नहीं, बल्कि ‘सक्सेस की सिग्नेचर फ्रेग्रेंस’ है। मुफ्त की हवा है जी, और मुफ्त में जो मिले, वह सबसे प्रीमियम क्वालिटी का होता है, बस एक्सपायरी डेट चेक मत करना!
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