बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

कुछ दिन पहले दक्षिण भारत के एक छोटे शहर में दीप कुमार जो एक स्वयंसेवी संगठन चलाते हैं, से मुलाकात हुई। मोदी की वजह से उनके द्वारा दलित उत्थान के कार्य में मुश्किलें आएंगी। उनकी चिंता है कि 30-40 लोगों के स्टाफ को कहां से सैलरी देंगे, कैसे वाहन चलेंगे। दीप कुमार के जैसे अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं को फॉरेन कंट्रीब्यूशन कानून में संशोधनों से बहुत वेदना है, आक्रोश है...

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन, आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है...

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साल 1455 में जब योहानेस गुटेनबर्ग ने चल अक्षरों वाली मुद्रण मशीन का आविष्कार किया, तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन किताबें छापना इतना आसान हो जाएगा कि हर लेखक स्वयं का प्रकाशक बन सकेगा। गुटेनबर्ग के छापाखाने ने ज्ञान को राजमहलों और मठों की दीवारों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। अब, लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष बाद, स्व-प्रकाशन उसी क्रांति को एक नए मुकाम पर ले गया है।

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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊंची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएं, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएं, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम ‘नए भारत’ की मंज़िल पर पहुंच गए हैं...

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हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुंचाकर इतिहास रचा। एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

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क्रिकेट मैच देखने के लिए टिकट खरीदने से आप क्रिकेटर नहीं बन सकते, वोट डालने से नेताजी नहीं बन सकते, लाल टोपी पहनने से क्रांतिकारी नहीं हो सकते, सिर्फ शादी होने से बाप नहीं कहलाए जा सकते, तो फिर पासपोर्ट बनवाने से भारतीय नागरिक कैसे?

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