अधिकारियों में बेअसर हो रही सपा नेताओं की फरियादें और सिफारिशें

मंत्रियों के पत्रों को भी तबज्जोे नहीं दे रहे जनपद के अधिकारी कर्मचारी

लोकसभा चुनावों की हार से भी सबक नहीं ले सका केन्द्रीय सपा नेतृत्व 

मथुरा। लोकसभा चुनावों में जनता द्वारा बुरी तरह नकार देने के बाद अब कानून व्यवस्था व बिजली संकट पर घिरी सपा सरकार अपने प्रदेश में ही बैकफुट पर आ गयी है। अन्य राज्यों में पार्टी विस्तार कार्यक्रम तो दूर पार्टी प्रदेश में भी अपनी साख बचा पाने में सक्षम नजर नहीं आ रही। वहीं जनपद मथुरा का हाल तो और भी बुरा है। यहां के अधिकारी कर्मचारी भी सत्तारूढ़ दल सपा के नेताओं को तबज्जों नहीं दे रहे है यहां तक कि जिले के अधिकारी सूबे के मंत्रियों की सिफारिशें भी मानने को तैयार नहीं दिख रहे। ऐसे में कैसे सपा सरकार जनपद में अपनी पार्टी का वजूद बना सकेगी। ये सवाल जनपद में अब इसी समस्या के इर्द गिर्द घूम रहा है।

जिस तरह से लोकसभा चुनावों में यहां की जनता ने सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी को मात्र कुछ हजारों वोटों में ही निपटाकर अपना पार्टी प्रेम दिखाया है। उसे देखकर तो यही लगता है कि समाजवादी पार्टी को जनपद में अभी बहुत बड़े स्तर पर जनता से जुड़कर काम करना होगा। वहीं पार्टी के लोग जनपद में सरकार की बेहतर छवि बनाने की कवायदों में जुटे भी है लेकिन समस्या वहां पैदा हो रही है जहां पार्टी के नेता और कार्यकर्ता लोगों की वाजिब जन समस्याओं को लेकर यहां के प्रशासनिक अधिकारियों के दरवाजे तक जाते है लेकिन कोई भी उनकी सुनवाई नहीं करता। जनपद का ये सच पार्टी के अलावा अन्य लोगों से भी छुपा नहीं है कि सपा के जिला स्तरीय नेताओं की जनहित की सिफारिशें भी यहां के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा नहीं सुनी जा रही। पार्टी के बड़े नेताओं की कृपा से यहां के मलाईदार पदों पर आसीन प्रशासन के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी यहां के स्थानीय नेताओं की सिफारिशें मानने में अपनी तौहीन समझते है बल्कि ये अधिकारी सूबे के मंत्रियों की सिफारिशों को भी तबज्जोें नहीं दे रहे है। इससे यहां पार्टी की साख तो गिर ही रही है साथ ही लोगों का प्रदेश सरकार से भी भरोसा उठता जा रहा है। यही कारण है कि अब लोग पार्टी से जुड़ना तो दूर पार्टी नेताओं से अपने मामलांे में सिफारिश कराना भी उचित नहीं समझ रहे। 

अभी हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों की हार का ठीकरा भी सभी सपाईयों ने एक स्वर से अधिकारियों की इसी कार्यप्रणाली के सिर फोड़ा है। हार से भी सबक न ले सका सत्तारूढ़ पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व अभी भी स्थानीय सपाईयों की इस पीड़ा के प्रति उदासीन बना हुआ है। यहां अधिकारियों के इस रवैये को लेकर पार्टी के स्थानीय नेता बार बार अपनी आवाज लखनऊ के गलियारों में बुलन्द भी करते रहे है लेकिन सत्तानशीं नेताओं को शायद कुछ भी सुनाई ही नहीं दिया ये शायद उन्हें तब सुनाई दे जब सरकार पांच साल पूरे कर चुनावों में आईना देखेगी। जब उनके हाथों में कुछ करने को नहीं होगा और सत्ता की चाबी किन्हीं दूसरे हाथों में पहुंच जायेगी। 

विगत दिनों एक ऐसा ही वाकया यहां नजर भी आया जब सूबे में चल रही प्राविधिक परीक्षाओं के छात्र का काॅलेज की गलती से ट्रेड बदल गया तो मामले में पार्टी के एक केन्द्रीय मंत्री ने हस्तक्षेप कर छात्र का भविष्य सुरक्षित करने का पत्र लिखा गया लेकिन यहां के अधिकारियों एवं काॅलेज के प्राचार्य द्वारा उसे पूरी तरह से दरकिनार कर छात्र का वर्ष खराब कर दिया गया। एक अन्य मामले में शहर की एक मूलभूत जन समस्या को लेकर प्रशासनिक अधिकारी के पास पहुंचे जिला स्तरीय सपा नेता की सिफारिश पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। अधिकारियों के इस रवैये को लेकर सपा नेताओं की जहां साखा गिर रही है वहीं अधिकारी कर्मचारी वर्ग जनपद में पूरी तरह से अपनी पर उतर आया है और गलत सही देखे बिना ही मनमर्जी के फैसले ले रहा है। लोग प्रशासन के इन तौर तरीकों को दखकर तो हर जगह यही करते नजर आते है कि इससे तो अच्छी पिछली सरकारें थी। कम से कम अधिकारी शासन से डर कर गलत कार्य करने में तो कतराते थे। अब तो सब कुछ खुलेआम किया जा रहा है।  

 


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