लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए?
तीन दशकों से भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का निज़ाम चला। कहा गया कि विकास होगा, दौलत बढ़ेगी, सबका भला होगा। हुआ क्या? अमीर और अमीर हो गए। ग़रीब वहीं खड़े रह गए, कई जगह और पीछे चले गए। शहर चमक उठे, लेकिन गांव सूने हो गए। अमीरी-गरीबी का फासला अब खाई बन चुका है।
Read in English: Why Donald Trump has become the ugly face of capitalism…!
दुनिया के मंच पर यह पूंजीवाद अब और भी बेनक़ाब हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप इस सिस्टम का सबसे बदसूरत चेहरा बनकर उभरे हैं। उनकी सियासत में तहज़ीब कम, घमंड ज़्यादा दिखाई दिया है। व्यापार युद्ध, ऊंचे टैरिफ, कमज़ोर देशों को “हैल होल” कहना; यह सब सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जहां ताक़त ही सच बन जाती है।
यह पूंजीवाद का वही चेहरा है, जो इंसान को इंसान नहीं, ‘माल’ समझता है। कामगार एक नंबर बन जाता है। मज़दूर एक लागत बन जाता है। और इंसानियत? वह कहीं गुम हो जाती है।
कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी कि यह सिस्टम इंसान के रिश्तों को सिर्फ पैसे के लेन-देन में बदल देगा। आज गिग इकॉनमी, ठेके पर काम, और प्रवासी मज़दूरों की हालत देखिए। सब कुछ वही कहानी कह रहे हैं।
रोजा लक्जेमबर्ग ने कहा था, या तो समाजवाद आएगा, या बर्बरता। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, यह बात और भी सच्ची लगती है। नफ़रत की राजनीति, धर्म और नस्ल के नाम पर बंटवारा; यह सब उसी बर्बरता की आहट है।
भारत में समाजवाद की सोच कोई पराई चीज़ नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने साफ कहा था: बराबरी के बिना भाईचारा एक झूठ है। जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक समाज में सच्ची मोहब्बत नहीं पनपेगी।
आचार्य नरेंद्र देव ने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का पूरक माना। उनका मानना था कि पूंजीवाद के तहत लोकतंत्र सिर्फ दिखावा है, असल ताक़त कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है।
आज भारत में यह सच्चाई साफ दिखती है। शहरों में ऊंची-ऊंची इमारतें हैं, लेकिन उनके साये में झुग्गियां भी हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है, लेकिन किसान कर्ज़ में डूबकर जान दे रहा है। नौजवान पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार है। यह कैसी तरक़्क़ी है?
दुनिया में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। ट्रंप की नीतियों ने दिखा दिया कि पूंजीवाद अब सिर्फ बाज़ार नहीं, बल्कि ताक़त का खेल बन चुका है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं कमज़ोर हो रही हैं। नियमों की जगह मनमानी चल रही है।
ऐसे में लोकतांत्रिक समाजवाद एक उम्मीद बनकर उभरता है। यह कोई ख़याली पुलाव नहीं है। यह एक संतुलित रास्ता है, जहां लोकतंत्र भी हो, और आर्थिक न्याय भी।
समाजवाद का मतलब सिर्फ सरकार का नियंत्रण नहीं। इसका मतलब है; हर इंसान को इज़्ज़त से जीने का हक़ मिले। अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, और रोजगार के मौके सबको मिलें।
नॉर्डिक देशों का मॉडल सामने है। वहाँ बाज़ार भी है, लेकिन मज़बूत यूनियन भी हैं। अमीर टैक्स देते हैं, और ग़रीबों को सहारा मिलता है। यही संतुलन समाज को स्थिर बनाता है।
भारत में भी कुछ कोशिशें हुई हैं। मनरेगा, मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने राहत दी है। लेकिन ये आधे-अधूरे कदम हैं। ज़रूरत है एक बड़े बदलाव की, नीतियों में, सोच में, और सियासत में।
आज सबसे ज़रूरी है इंसान को केंद्र में रखना। मुनाफा नहीं, इंसानियत अहम हो। विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो।
मई दिवस भले फीका पड़ गया हो, लेकिन उसका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। यह हमें याद दिलाता है कि हक़ मांगने से नहीं, लड़ने से मिलते हैं।
पूंजीवाद ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया। अब वक़्त है सोचने का; क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे, या कोई नया रास्ता चुनेंगे?
लोकतांत्रिक समाजवाद कोई पुरानी किताब का सपना नहीं। यह आज की ज़रूरत है। यह वह रास्ता है, जहां इंसान, इंसान बना रहता है, न कि सिर्फ एक ग्राहक या मजदूर। और, शायद यही सबसे बड़ी लड़ाई है, इंसान को इंसान बनाए रखने की।






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