चम्बल। नाम लेते ही दिल धक से धड़क जाता था। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं के बीच पसरे वे बीहड़ किसी भूगोल की साधारण रचना नहीं हैं। वे धरती के फटे हुए सीने जैसे थे, गहरे, टेढ़े मेढ़े, रहस्यमयी। सूरज की रोशनी भी वहां सीधी नहीं उतरती थी, जैसे डरती हो कि कहीं लौट न पाए। धूल ऐसी उड़ती थी मानो हर कण में एक अधूरी कहानी अटकी हो। कहीं खामोशी इतनी गाढ़ी कि कानों में गूंजने लगे, तो कहीं अचानक किसी अज्ञात दिशा से आती आवाज दिल की धड़कन बढ़ा दे।
1960 और 70 का दशक। यह वह समय था जब चम्बल सिर्फ एक नदी नहीं, वह एक मनःस्थिति थी। सड़कें वहां जाकर खत्म हो जाती थीं। कानून कागजों में रह जाता था। शासन की पहुंच बीहड़ों की गहराई में खो जाती थी।
Read in English: Chambal’s ravines, redemption, and the day rebels chose humanity
बीहड़ों की धरती पर चलना आसान नहीं था। पांव रखते ही मिट्टी खिसक जाती। एक मोड़ के बाद क्या है, कोई नहीं जानता। कांटेदार झाड़ियां, गहरी खाइयां, सांपों की सरसराहट, और ऊपर आसमान में मंडराते गिद्ध। यह प्रकृति का ऐसा दुर्ग था, जिसे इंसान ने नहीं बनाया, पर जिसने इंसान को अपने हिसाब से ढाल लिया। इन्हीं बीहड़ों में जन्म लेते थे बागी।
डकैत कह देना आसान है, पर कहानी उससे कहीं ज्यादा जटिल थी। कोई किसान था जिसे जमींदार ने कुचल दिया। कोई युवा था जिसे पुलिस की ज्यादती ने विद्रोही बना दिया। कोई ऐसा था जिसे न्याय नहीं मिला, और उसने बंदूक उठा ली।
बीहड़ों में कानून की किताब नहीं चलती थी। चलती थी बंदूक की नली और बदले की आग। लेकिन हर कहानी में सिर्फ अंधेरा नहीं होता। कहीं न कहीं रोशनी भी जन्म लेती है। और चम्बल में वह रोशनी लेकर आए कई गांधीवादी, सर्वोदय के नेता, आचार्य विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण, आदि। दुबला-पतला शरीर। शांत चेहरा। न कोई हथियार, न कोई डर। बस एक विश्वास कि इंसान बदल सकता है। यह विश्वास लेकर वे बीहड़ों में उतरे। जहां पुलिस जाने से कतराती थी, वहां वे नंगे पांव चले। इस आंदोलन को नई ताकत मिली, और लोग जुड़े।
कहानी किसी फिल्म की तरह लगती है, लेकिन यह हकीकत थी। डकैतों ने संदेश भेजा। वे आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, लेकिन अपमान नहीं सहेंगे। और फिर वह दिन आया जब बीहड़ों ने एक अनोखा दृश्य देखा। मंच सजा। भीड़ जुटी। पुलिस भी थी, प्रशासन भी। और फिर एक-एक करके बागी सामने आए।
हाथों में बंदूक थी, लेकिन सिर झुका हुआ। उन्होंने हथियार जमीन पर रख दिए। उस दिन गोली नहीं चली। तालियां बजीं। यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं था। यह एक युग का अंत था और दूसरे युग की शुरुआत।
इस पूरी कहानी ने सिनेमा को भी गहराई से प्रभावित किया। उस दौर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘गंगा जमुना’, ‘मुझे जीने दो’, नायक डकैतों के दिल बदल देते दिखते हैं। आ अब लौट चलें! सुनील दत्त की ‘मुझे जीने दो’, बीहड़ों की सच्चाई को बिना किसी परदे के दिखाती है। और वर्षों बाद ‘पान सिंह तोमर’ यह याद दिलाती है कि हर डकैत के पीछे एक टूटा हुआ इंसान होता है। सिनेमा ने चम्बल को सिर्फ रोमांच नहीं बनाया। उसने उसे समझने की कोशिश की।
1970 के दशक में, एक युवा पत्रकार के रूप में, मैंने चम्बल को करीब से देखा। बीहड़ों में चलते हुए ऐसा लगता था जैसे समय थम गया हो। हर मोड़ पर एक कहानी थी। किसी का नाम इतिहास में दर्ज हुआ, किसी का नहीं। लेकिन दर्द सबका एक जैसा था।
मैंने उस समय लिखा था कि भारत ने चम्बल में सिर्फ डकैतों को नहीं हराया, उसने अपने ही भटके हुए लोगों को वापस पाया। वह लेख विदेशों में भी *प्रकाशित हुआ और यह अनुभव आज भी मन में ताजा है। सैकड़ों खूंखार बागियों ने जब मुरैना में आत्मसमर्पण किया तो लगा कि यह किसी और दुनिया की कहानी थी। लेकिन नहीं, वह यहीं हुआ था, हमारी ही धरती पर।
आज जब समाज फिर से तनाव और विभाजन के दौर से गुजर रहा है, तब चम्बल की यह कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें सिखाती है कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका समाधान न हो सके। जरूरत होती है विश्वास की, संवाद की, और धैर्य की।
चम्बल आज भी है। बीहड़ आज भी हैं। लेकिन अब वहां डर की नहीं, इतिहास की गूंज सुनाई देती है। जब हवा उन खाइयों से गुजरती है, तो लगता है जैसे वह कोई पुरानी कहानी सुना रही हो। एक ऐसी कहानी जिसमें बंदूकें थीं, खून था, लेकिन अंत में जीत इंसानियत की हुई। चम्बल की धूल अब भी उड़ती है। लेकिन अब उसमें डर नहीं, इतिहास की खुशबू है।
*The 1977 article by Brij Khandelwal (under the byline "By Brij Khandelwal, Gemini News, London") appears on page 8 of the New Nation (Singapore) issue dated 16 January 1977.






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