कितनी दूर है 'अच्छे' दिनों की शुरुआत...

पवन तिवारी

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद हुई बहस का जवाब देते हुए दिया गया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण कई मायनों में अहम था। इस भाषण को सुनने के बाद ऐसा लगा कि देश की राजनीति में शायद 'अच्छे दिन' आने वाले है।

मोदी एक चतुर राजनेता है। अभी मोदी सरकार के लगभग दो ही हफ्ते हुए हैं और इस दौरान उन्होंने परिवर्तन की कई नई आशाओं को जगाया है। देश की भ्रष्ट हो रही राजनीति को सुधारने के लिए मोदी ने अपने सभी मंत्रियों से उनकी संपति का ब्यौरा मांगा है और मंत्रियों से किसी भी प्रकार के व्यवसाय से दूर रहने की बात की है। पर, क्या संपति का ब्यौरा और व्यवसाय से दू रहने की नसीहत देने से देश की रंगों में खून की तरह बहने वाला भष्टाचार दूर हो जाएगा...?

अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने ग्रामीण विकास और गुजरात मॉडल समेत कई मसलों पर अपने गृह राज्य गुजरात का हवाला दिया। कृषि विकास का मामला हो या स्किल डेवलपमेंट..., कई मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने कहा कि गुजरात में उन्होंने कई सफल कार्यक्रम चलाए हैं। लेकिन, क्या देश के एक छोटे से राज्य गुजरात की तुलना भारत जैसे विकासशील देश से करना सही है।

प्रधानमंत्री के भाषण को नि:संदेह 'अच्छा' था लेकिन अब वक्त आ गया है कि कुछ काम जमीन पर भी दिखे।

कई वर्षों के बाद देश की जनता ने स्थिर सरकार के लिए जनादेश दिया है। अब देश के प्रधानमंत्री को देश की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की चिंता होनी चाहिए ताकि 'अच्छे' दिनों की शुरुआत हो सके।


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