गीतामय था गीतानंद महाराज का जीवन

गीतानंद जी महाराजराष्ट्र के प्रति था असीम प्यार और श्रद्धा

महाराज श्री ने कराई अनेक मंदिरों की स्थापना

मथुरा। वृक्ष कबहुं नहिं फल चखै, नदी न संचय नीर। परमारथ के कारणै, साधुन धरा शरीर।। महात्मा कबीर दास जी की उक्त पंक्तियां देश के सुविख्यात धर्माचार्य तपोमूर्ति स्वामी गीतानंद जी महाराज पर एकदम सटीक बैठतीं हैं। वृन्दावन की पावन भूमि महानत संतों के कारण सैकडों वर्षों से भटके मानव के आकर्षण का केन्द्र रही है। चैतन्य महाप्रभू से जीव गोस्वामी तक, बाबा नीम करौली से देवराह बाबा तक और स्वामी अखंडानंद महाराज, स्वामी वामदेव, श्रीपाद बाबा एवं आनंदमयी मां तक ने अपने तप से वृन्दावन की पावन भूमि को यदि धन्य किया है तो सद्गुरूचरण स्वामी गीतानंद महाराज ने अपने जीवन का लक्ष्य ही मानव कल्याण रखा था। स्वामी गीतानंद जी का सम्पूर्ण जीवन समाज के लिए समर्पित था। उनके प्रत्येक कार्य में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना परिलक्षित होती हैं।  स्वामी जी होने को तो संत भेषधारी थे, किंतु उनकी कृपा से देश के लाखों परिवार नहाल हुए। उन्होंने वृन्दावन की पावन भूमि से गीता के संदेश से ऐसी अमृत रस की वर्षा की कि आज के प्रतियोगितापूर्ण समय में इसका रसास्वादन करने महाराजश्री के पास जो आया, उसके मन को ऐसी शांति मिली कि उसके लिए वृन्दावन का आश्रम ही तीर्थ बन गया। कहा जाता है कि संत भगवत शक्ति का ही रूप होते हैं। जैसे जल का स्वभाव हर एक को शीतलता प्रदान करना है, वैसे ही संतों का सहज स्वभाव दु:खी एवं संतृप्त जीवों पर करूणा करके उन्हें कल्याणकारी मार्ग की ओर अग्रसित करता है। महान संत गीतानंद महाराज जी ऐसी ही विशेषताओं के कारण अपने शिष्यों के लिए आराध्य बन गए। महाराज श्री १९५८ में भिक्षाटन करते हुए कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) पधारे। बताते हैं जब वे प्रवचन करते व भजन गाते थे तो पूरी कुल्लू घाटी का वातावरण आध्यात्मिक हो जाता था। पानीनत हरियाणा में सन् १९६१ में उनके सार्वजनिक जीवन की शुरूआत हुई। वहां उन्होंने परमहंस कुटिया में प्रवचनों की श्रंखला प्रारंभ की। मानवता के इस पुजारी की रसवाणी का प्रभाव १९६२ में भारत और चीन के मध्य हुए युद्ध के दौरान हमें देखने को मिला। महाराजश्री की मार्मिक अपील पर सैकड़ों महिलाओं ने शरीर पर धारण मंगलसूत्र तक उतार कर राष्ट्रीय सहायता कोष में दान कर दिये थे। इसी श्रंखला को दोहराते हुए सन् १९६५ व सन् १९७१ के युद्ध के दौरान भी महाराजश्री ने राष्ट्रीय सहायता कोष में काफी धन एकत्रित कर सरकार को भेजा था। पानीपत के रेलवे स्टेशन पर देश की सुरक्षा में जाने वाले सैनिकों को खाने के पैकेट व फल आदि का वितरण कर उन्होंने हौंसला बढ़ाया। कारगिल युद्ध के दौरान भी राष्ट्रीय सुरक्षा में ११ लाख रूपये का ड्राफ्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रीय कोष के लिए दिया गया। १९९१ में उत्तर काशी में आये भूकंप के दौरान महाराज श्री ने मौन अवस्था में रहते हुए भी अपने भक्तों को तत्काल राहत सामग्री लेकर भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में जाने का आदेश दिया। उनके अनुयायी सामान से भरे दर्जनों ट्रक लेकर पहुंचे। उसके बाद महाराजश्री स्वयं भी भटवाड़ी जामक, लातूर आदि स्थानों पर शिविर लगाकर प्रभावित लोगों को सहायता बांटते गये। कुरूक्षेत्र को राजकीय मान्यता दिलाने में महाराजश्री की अहम भूमिका रही। महाराजश्री ने ही १९७६ में सर्वप्रथम ब्रह्मसरोवर के किनारे गीता जयंती के उत्सव की शुरूआत की, जोकि आज भी अनवरत रूप से जारी है। महाराजश्री के प्रयासों के फलस्वरूप ही कुछ वर्षों पूर्व हरियाणा सरकार ने गीता जयंती पर्व को राष्ट्रीय पर्व की संज्ञा प्रदान करते हुए इसे राज्य स्तर पर मनाने की घोषणा की। तभी से गीता जयंती को कुरूक्षेत्र में राज्य स्तर पर भी मनाया जाता है। सन् १९६६ में उन्होंने गौ रक्षा आन्दोलन में दो बार संतों के जत्थों का नेतृत्व करते हुए जेल यात्रा भी की। तिहाड़ जेल में उनके प्रवचनों से प्रभावित होकर तमाम कैदियों ने आपराधिक जीवन त्याग दिया। गौ रक्षा के संबंध में मुनिश्री हरमिलापी जी को साथ लेकर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से उनके आवास पर मंत्रणा की। वह केवल गौ रक्षा का नारा लगाने वाले ही संत नहीं थे, अपितु उन्होंने व्यवहारिक रूप से हरिद्वार, कुरूक्षेत्र, पानीपत, दिल्ली, फतेहाबाद आदि स्थानों पर स्थित आश्रमों में आदर्श गौशालाएं स्थापित कीं। महाराजश्री ने हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश,  पश्चिमी उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड में अनेक स्थानों पर गरीब व असहायों की सेवा के लिए आश्रमों की स्थापना की। १९७०-८० के मध्य हिंद समाचार पत्र के संस्थापक श्री जगत नारायण जी पूज्य महाराजश्री के काफी सम्पर्क में रहे। महाराजश्री के सुझाव पर लालाजी ने हरिद्वार में वृद्धाश्रम बनाने का निश्चय किया। इससे पहले कि इस विषय में कुछ किया जाता लालाजी उग्रवादियों के हाथों शहीद हो गये। उनके सुपुत्र श्री रमेश चन्द्र जी के हाथों से महाराजश्री ने हरिद्वार के वृद्धाश्रम की २ अक्टूबर १९८२ में नींव रखवाई। आज वृद्धाश्रम में वृद्ध अपना शेष जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत कर रहे हैं। हरिद्वार के अतिरिक्त दिल्ली, कुरूक्षेत्र, भिवानी, पानीपत में भी वृद्धाश्रम चल रहे हैं। महाराज श्री ने निर्धन असहायों के लिए राशन व्यवस्था भी प्रारंभ की। महाराजश्री ने अपने जीवन में असंख्य मंदिरों की स्थापना की। उनका मानना था कि मंदिर के माध्यम से हद्य मंदिर के पट भगवान के लिए खुल सकते हैं। इस तरह अनेकों अनुकरणीय कार्य करके महाराजश्री ब्रह्मलीन हो गये।

 

विराट श्रद्धांजलि सभा कल

मथुरा। वृन्दावन के गांधी मार्ग स्थित श्री गीता आश्रम में उत्तराखंड की पावन महान विभूति सद्गुरूदेव श्रीस्वामी गीतानंद जी महाराज भिक्षु: संस्थापक गीता आश्रम, वृन्दावन की द्वादश पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में २७ नवम्बर को विराट श्रद्धांजलि सभा एवं भण्डारा का आयोजन किया जायेगा। इस संबंध में डा.स्वामी अवशेषानंद जी महाराज ने बताया कि इस अवसर पर सद्गुरूदेव श्रीस्वामी गीतानंद जी महाराज भिक्षु: की स्मृति में २७ नवम्बर को अपरांह २ बजे से ४:३० तक गीता आश्रम, वृन्दावन में एक विराट श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है, जिसमें सम्पूर्ण भारत के उच्चकोटि के संत महापुरूष, राजनेता, समाजसेवी एवं श्रद्धालु भक्तगण उपस्थित होकर श्रद्धांजलि एवं भावांजलि अर्पित करेंगे। उन्होंने बताया कि श्रदांजलि सभा के पश्चात सायं ४:३० बजे महन्तों, महामंडलेश्वरों का विशेष भण्डारा होगा।

 


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