झील की जमीन में विकसित की जा रही अवैध कालोनियां
सपनों का आशियाना पाने जीवन भर की जमा पूंजी का कट रहा लोगों का टटलू
अनभिज्ञ बना सोया हुआ विकास प्राधिकरण तब जागेगा जब लोग घर बना चुके होंगे
अवैध कालोनी में खड़े झूठे विद्युत पोल और अधूरी सड़कें
मथुरा। सपनों का आशियाना और अपना घर बनाने को आम आदमी हर कदम पर बार बार ठगा जा रहा है। तरह तरह के सब्जबाग दिखा और नाना प्रकार के प्रलोभन देकर मकानों और जमीनों का कारोबार करने वाले माफिया दिन दूनी और रात चैगुनी संख्या में बढ़ कर किसी भी आदमी की जिन्दगी भर की कमाई को ठगते समय इक पल भी नहीं सोचते। ठगी के शिकार बने लोगों को भी इसकी तभी पता लग पाती है जब विप्रा या शासन प्रशासन का महाबली उन पर बरसता है। जबकि उनके साथ हो रही ठगी के दौरान विप्रा या शासन प्रशासन सोया ही रहता है।
ऐसा ही वाकया इन दिनों शहर मुख्यालय से मात्र कुछ ही दूरी पर हैलीपैड से तन्तूरा गांव को जाने वाले मार्ग पर दिखने को मिल रहा है। यहां एक साथ कई कालोनियां पूरी तरह अवैध रूप से विकसित की जा रही है। इनके पास न तो कोई स्वीकृत मानचित्र ही है और न ही कालोनियां विकसित करने के इनके कोई मानक यहां नजर आते है। मुख्य मार्ग के सहारे ही झील सी गहराई की जमीन में विकसित की जा रही यहां करीब तीन कालोनियां पूरी तरह अवैध रूप से धड़ल्ले से काटी जा रही है। खरीददार ग्राहकों को लुभाने भर के लिये यहां डाले गये कमजोर रोड, सफेद हाथी सरीखे विद्युत पोल, बिना जल निकासी वाली सूखी नालियां और तय की गयी बेशकीमती कीमतों वाले यहां के प्लाट जब लोगों को सस्ती दरों पर मिलने लगते है तो वे झांसे में ही आ जाते है और अपने सपनों का अशियाना अपना घर बनाने को एकत्रित की जीवन भर की सारी जमा पूंजी उन कालोनाईजरों को ठग बैठते है।
जिले के थाना क्षेत्र गोवर्धन, बरसाना, शेरगढ़ आदि में भी इन्ही की भांति बेशकीमती सोने ईंट दिखाकर टटलू गैंग के बदमाश लोगों को नकली सोने की ईंट थमा कर जिस प्रकार से ठगते है वही तरीका यहां भी खुलेआम इस सफेदपोश धन्धे में इन ठग काॅलोनाईजरों द्वारा अपनाया जा रहा है। यहां भी ये टटलू काॅलोनाईजर अपनी कालोनियांे को मथुरा वृन्दावन विकास प्राधिकरण से स्वीकृत, विद्युतीकरण युक्त, पेयजल आदि से परिपूर्ण, गार्डन अथवा खुले स्थान युक्त पानी की बेहतर निकासी आदि सुविधायुक्त बताकर लोगों को ठग रहे है। साथ ही पहले तो प्लाॅट या मकान खरीदने वाले ग्राहक को उसी प्लाट या मकान के रेट 20 से 25 हजार तक बताकर उसे बेशकीमती साबित कर देते है फिर उन्हीं के दलाल और ऐजेन्ट उन्ही प्लाट और मकानों को आधी से कम कीमत में ग्राहकों को दिलवा देते है। ग्राहक भी सस्ते और सुविधाओं के लोभ में आकर अपना टटलू कटा बैठते है। सच्चाई का उन्हें तब पता चलता है जब वे मकान आदि बनाते है या विप्रा या शासन प्रशासन का महाबलि वहां आ धमकता है। उसके बाद उन ग्राहकों के शोषण का जो दौर आरम्भ होता है वो शायद ही किसी किसी का थमता देखा गया हो। ये विप्रा और शासन प्रशासन का महाबलि वहां तब कभी नहीं पहुंचता जब उन ग्राहकों का टटलू काटा जा रहा हो।






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