डालियों से गायब ‘सावन के झूले’

मथुरा। प्रेम,श्रंगार एवं पूजन का पवित्रा मास सावन शुरू हुए सप्ताह भर हो चुका है, परन्तु सावन का स्वागत करने वाले गावों में डाली-डाली पर झूलते झूले ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं।  शहरों के बाद गांव में भी वर्षों से चली आ रही परंपरा विलुप्त होती चली जा रही है। सावन की हवाओं का शोर एक नए सुर, लय, ताल को जन्म देकर नई उमंग बिखेरता है। साथ ही साथ यह मास चपलता और अल्हड़ता का माना जाता है। कुछ वर्षो से इस मास की आभा क्षीण होती जा रही है। पहले सावन का स्वागत कजरी, गीत व झूले के साथ किया जाता था। हिन्दू ध्र्म में सावन मास का विशेष महत्व है। यह मास हमारी परंपरा, धर्म, रीति-रिवाज से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यही मास भाई-बहन के साथ तमाम रिश्तों के पवित्रा प्रेम और स्नेह की डोर से जोड़ता ही हैं। शहरीकरण की ओर बढ रहे गांवों में सावन की अल्हड़ताल की गूंज सुनने को नहीं मिलती। सावन के मेघों के गुजरने पर जो खुशी लोगों के चेहरों पर देखने को मिलती थी, वह भी उनके चेहरों से गायब है। जनपद में लोग सावन माह की उमंग एवं तरंग को विस्मृत होकर भूल रहे हैं।


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