निवेश पुनर्वापसी चक्र की दहलीज पर पहुंचा भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नई सरकार ने पहले छह माह का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के वास्तविक क्षेत्रों की गतिविधियों में वापसी के पूर्वानुमान जैसे कि कृषि, उत्पादन और सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय और काफी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है। 

ऐसा नहीं है कि सरकार ने नीतिगत मोर्चे पर सुधारों की बड़ी सूची उद्घाटित की है, जिस वजह से बाजार में उछाल आया है लेकिन दूसरी तरफ तथ्य यह भी है कि मौजूदा सरकार ने उस नीतिगत सुस्ती को तोड़ा है और वास्तविक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बहुत सारी उन कमियों में सुधार सुनिश्चित किए हैं जिन्होंने पहले घरेलू व अंतरराष्ट्रीय दोनों ही तरह के निवेशकों की धारणाओं को नुकसान पहुंचाया था। नई सरकार ने उन्हें आशावान बनाया है।

एक दशक बाद केंद्र की सत्ता में लौटी एनडीए सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा जुलाई 2014 में पेश किए गए पहले बजट से शुरू हुए सुधार अभी तक जारी हैं, सरकार ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एक साथ नीतियों में बदलाव की बाढ़ लाने जैसे आत्मघाती व खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसे काम की बजाय सावधानीपूर्वक व नियंत्रित ढंग से कदम उठाने शुरू किए हैं। निश्चित तौर पर, नई सरकार की इस उपलब्धि का श्रेय निचले सदन में पूर्ण बहुमत को भी दिया जाना चाहिए। दो दशकों के गठबंधन शासन में आर्थिक नीतियां, गठबंधन के दबाव और अनिवार्यताओं की शिकार रहीं और इस दौरान कुछ भी अलग नहीं कर सकी, ना ही कोई वृद्धि देखने को मिली। पिछली सरकार की नीतिगत अनिश्चितता की वजह से बुनियादी विचारों को बढ़ावा नहीं मिल सका। बल्कि नीतिगत कमजोरी को खत्म करने के मकसद से कुछ व्यावहारिक नीतियों को सजा संवारकर उन्हें आधे-अधूरे तरीके से लागू कर दिया गया।

शासक में बदलाव का पहला लक्षण सरकार के उस फैसले में देखा गया जिसमें कई सारी कैबिनेट समितियों व अधिकार प्राप्त मंत्री समूहों को विघटित करने को कहा गया। यह समितियां एक दशक से महत्वपूर्ण फैसलों पर कुंडली मार कर बैठी थीं और निर्णय लेने में अनावश्यक समय जाया कर रही थीं और इसमें शामिल विपक्षी पार्टियों की गर्मागर्मी एक-दूसरे के फैसलों को रोक देती थी। इन्हें भंग करने के फैसले से अर्थव्यवस्था में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह देखा गया। नीति निर्धारण से संबंधित अंतर-मंत्रालयी मुद्दों पर फैसले के लिए एक पखवाड़े की समय सीमा निर्धारित कर दी गई। इससे साझीदारों में एक अच्छा संदेश गया। अब उन्हें नीति निर्धारण में अनिश्चितता से अटकने की परवाह नहीं रही और ना ही निवेशकों को लंबे समय तक अधर में टंगे रहने की चिंता रही।

कृषि के मुख्य क्षेत्र में सरकार ने कुछ कड़े फैसले लिए और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में केवल सही वृद्धि की घोषणा की जिससे कि अक्षरणीय खाद्य सब्सिडी के बिल को ठीक किया जा सके। इससे सार्वजनिक खर्च में हुई बचत का सार्वजनिक कार्यक्रमों में निवेश के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही साथ प्राधिकारियों ने खाद्य पदार्थों के जन भंडारण को भी कम किया और उन्हें खुले बाजार में निकाला ताकि इस तरह के जमा की खाद्य सामग्री के दाम में कमी आ सके। यह भी सुनिश्चित किया गया कि बाजार में अनाज की और अधिक आपूर्ति की अनुमित दी जाए बजाय इसके कि वो गोदामों में पड़े-पड़े सड़े। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पुनर्गठन का प्रयास जारी है, वितरण घाटे और परिवहन पर भारी खर्च में कटौती की जा रही है व जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) को प्रभावी बनाया जा रहा है, ताकि वास्तविक जरूरतमंद सस्ती चीजों की आपूर्ति से दूर ना रह जाएं।

किसानों व उत्पादकों, ज्यादातर फल, सब्जी व स्थानीय उपभोग की वस्तुओं के उत्पादकों को इन सामानों को स्थानीय कृषि उत्पाद विपणन समितियों को बेचने के बोझ से मुक्ति मिली और इससे वे अपने परिश्रम, पसीने व मेहनत का व्यापक खुले बाजार में अच्छा दाम पा सकते हैं। चूंकि सरकार किसानों को सहायता के लिए कटिबद्ध है इसलिए उनकी कड़ी मेहनत का मूल्य मिले और इसके लिए सरकार मौजूदा कार्यक्रमों को पुनर्गठित कर व विस्तारित सेवाओं संबंधी शिकायतों को दूर कर तनावमुक्त खेती का वातावरण तैयार करने पर ध्यान दे रही है ताकि बर्बादी को खत्म किया जा सके और उत्पादकता को बढ़ाया जा सके। कृषि ऋण लक्ष्य आठ लाख करोड़ रुपये तय किए गए हैं साथ में सरकार ने ब्याज पर छूट योजनाओं को भी जारी रखा है। ग्रामीण ढांचागत विकास फंड को 25,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया है।

उत्पादन के मोर्चे पर सरकार ने “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम शुरू किया है ताकि भारतीय उत्पाद मूल्य व गुणवत्ता के मामले में ना केवल देश में बल्कि बाहर भी प्रतिस्पर्धा में खुद को खड़ा कर सके। घरेलू उत्पादन को समर्थ बनाने के क्रम में स्थानीय उत्पादन के लागत में कमी के लिए प्राधिकारियों ने कई कदम उठाए हैं जिससे की देश में प्रशासनिक कार्यवाहियों से व्यावसायिक संस्कृति सुधारी जा सके ताकि वृद्धिउन्मुख व व्यवसाय उन्मुख नजरिये की ध्वनि साफ सुनाई दे और उद्यमी ऐसे माहौल का लाभ ले सके। यहां तक कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने थोड़े समय बाद फिर से कहा कि वृद्धि उन्मुख व व्यवसाय उन्मुख नजरिया, गरीबसमर्थित नीतियों के बरख्श खड़ी नहीं है। नतीजतन उच्च वृद्धि से सरकार के उन सार्वजनिक कार्यक्रमों जिसमें गरीबी उन्मुलन में मदद करने वाले वास्तविक कल्याण उपाय भी शामिल हैं, के खर्च में बढ़ोतरी की भरपाई हो सकेगी। सरकार ने महत्वपूर्ण क्षेत्र जैसे कि रक्षा व रेलवे को बाहरी निवेश के लिए खोल दिया है और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा बढ़ाई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से निश्चित तौर पर आगे चलकर इन क्षेत्रों में तकनीक के हस्तांतरण व बेहतर प्रबंध कौशल का विकास देखने को मिलेगा। उत्पादन क्षेत्र को ऊर्जा केंद्र की जरूरत है, सरकार ने घरेलू व औद्योगिक दोनों उपभोक्ताओं की ऊर्जा स्थितियों में सुधार के लिए कई सारे कदम उठाए हैं। 

साल 1993 के बाद से आवंटित 200 कोल ब्लॉक के आवंटन को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दर्जनों ऊर्जा क्षेत्र कंपनियों को बिजली वितरण पर अनिश्चितता में डाल दिया था लेकिन सरकार इस भ्रम की स्थिति को खत्म करने के लिए 20 अक्टूबर को एक अध्यादेश लाई। सरकार अब इन ब्लॉक्स को दुबारा पारदर्शी, ऑन नीलामी के जरिये आवंटित सकती है। पूर्व में इसे अनैतिक तरीके से बांटने और आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। कोयला क्षेत्र में नवीनतम नीलामी से ऊर्जा, स्टील व सीमेंट कंपनियों को कोयले की आपूर्ति जारी रखने में सहायता मिलेगी और कोयला उत्पादक राज्यों केंद्र की बजाय नीलामी से सीधे राजस्व मिल सकेगा। नए अध्यादेश में कोल खदानों को निजी कंपनियों के लिए खोलने की जरूरत को भी मान्यता देने का प्रावधान रखा गया है। 

इस सब ने अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी के हालिया नजरिये में बदलाव लाया है और इसने भारतीय गैर-आर्थिक कोर्पोरेट को नकारात्मक से स्थायी का दर्जा दिया है। इसकी पृष्ठभूमि में ठोस और वाजिब वजह है, मूडी के उपाध्यक्ष व वरिष्ठ ऋण अधिकारी विकास हेलेन के शब्दों में कहें तो, “भारत की अर्थव्यवस्था सुधर रही है, पूंजी बाजार तक पहुंच बढ़ी है और बाजार समर्थित नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया जा रहा है जिससे कॉर्पोरेट पूंजी के प्रवाह को बढ़ावा मिलेगा और इससे बड़े स्तर पर बिजनेस में वृद्धि होगी।” इसके अलावा अप्रैल 2014 से भारत में एफडीआई के प्रवाह में बढ़ोतरी हुई है। एफडीआई में बढ़ोतरी का ये ट्रेंड आने वाली तिमाही में भी जारी रहने वाला है क्योंकि देश में वृद्धि को बढ़ाने वाली नीतियों व सकारात्मक आर्थिक माहौल का दौर चल रहा है। मूडी के एक अन्य वरिष्ठ शोध विश्लेषक राहुल घोष भी कहते हैं कि “एफडीआई के प्रवाह में बढ़ोतरी से भारत के खाते में मौजूदा कमी को दूर किया जा सकेगा, इससे अर्थव्यवस्था की सामने बाहर की विपरित परिस्थितियों को कम किया जा सकेगा।” 

आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर डॉ. राकेश मोहन ने हाल में मेक्सीने ग्लोबल इंस्टीट्यूट की अनु मेडगावकर के साथ लिखे पत्र में माना है कि भारत का आर्थिक आंकड़ा “आशाजनक” है। 2025 तक  जीडीपी वृद्धि का वार्षिक औसत 6.4 से 7.7 के बीच रहने का अनुमान है। वह कहते हैं कि पिछले साल के 4.7 प्रतिशत दर के मुकाबले यह 2012 तक के पिछले दशक के 7.7 प्रतिशत औसत के करीब है। इसके अतिरिक्त वह यह भी कहते हैं कि यह बढ़ोतरी भारत को दुनिया के सर्वाधिक तेज वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं में रखेगी और भारत में विवेकगत सामान का उपभोग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या जो 2012 में 27 मिलियन थी वह 2025 तक बढ़कर 89 मिलियन हो जाएगी।

सबसे खास बात, जापानी आर्थिक सेवा प्रमुख नोमुरा ने कहा कि भारत के लिए इसके समग्र महत्वपूर्ण संकेत सुझावों को मुताबिक इसकी अर्थव्यवस्था पहले ही उछाल पर है और यह व्यवसाय चक्र की पुनर्बहाल के शुरुआती चरण में है। जापान का आर्थिक प्रमुख ठीक ही यह अनुमान लगा रहा है कि भारत का सुधार होगा लेकिन ‘चरणबद्ध तरीके’ से, न कि हड़बड़ी में और ‘सुधारों के ठोस स्तर’ ने ही इस सरकार को वैश्विक निवेशक समुदाय के लिए प्यारा बना दिया है। नीति विश्लेषकों के अनुसार इस समुदाय को भारत आने व यहां लंबे समय के लिए निवेश कर अर्थव्यवस्था में मौजूदा सुधार का सहजता से लाभ लेने का मौका है इससे उन्हें आपेक्षित लाभ से ज्यादा मिल सकेगा।


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