बच सकती थी जांबाजों की जान...!

बच सकती थी जांबाजों की जान...!पिछले दो साल से जवाहर बाग में जबरन कब्जा जमाए और कथित सत्याग्रहियों को हटाने के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा की गई हीला-हवाली  और ढील का परिणाम आज सबके सामने है। इसके लिए सीधे तौर पर कौन-कौन जिम्मेदार है, यह अब सब 'जान' गए हैं।  जहां एक ओर राज्य की सपा सरकार इस मामले को स्थानीय प्रशासन की चूक बताकर अपना पल्ला झाड़ रही है वहीं पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की कमिश्नरी जांच की बात कहकर उसे चुप्पी साधने का अचूक बहाना भी मिल गया है।  भले ही उनका यह बहाना अचूक है परंतु उनकी अंतर्आत्मा हर पल इसी बात पर उनको झकझोरती जरूर होगी कि यह एक चूक तो है, और  यदि यह चूक न होती तो दो लोकप्रिय, ईमानदार जांबाज पुलिस अधिकारियों को अपनी जान न गंवानी पड़ती। इस घटना के बाद मीडिया  सहित कई समूह स्थानीय गुप्तचर शाखा के सिर पर ठीकरा फोड़ने में लग गए जबकि सत्यता यह है कि स्थानीय खुफिया इकाई ने अपनी  रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया था कि अंदर जो कुछ चल रहा है वह ठीक नहीं लेकिन लखनवी कॉल के चलते किस तरह इस खुफिया रिपोर्ट को नजरंदाज किया गया, यह कई सवाल खड़े करता है। इस घटना के लिए स्थानीय खुफिया इकाई को दोषी ठहराने वाले शायद यह भी भूल गए हैं कि पुलिस विभाग में सर्विलांस सेल और आईटी  सेल भी नाम की कोई शाखा भी है। सर्विलांस सेल वो शाखा है जो बड़े से बड़े शातिरों के मोबाइल नंबर हासिल करने के बाद उनकी लोकेशन  और विभिन्न नंबरों से बातचीत का ब्यौरा भी हासिल कर लेती है। सही मायनों में यदि रामवृक्ष यादव और उसके खास सिपासलारों के नंबर  ट्रेस करती तो निश्चित रूप से खुलासा होता कि वह किन लोगों के संपर्क में था। ऐसे लोग जो हजारों लोगों की प्रतिदिन रसद के लिए मोटी धनराशि उपलब्ध करा रहे थे। पुलिस चाहती तो रामवृक्ष के नंबरों को ट्रेस कर यह भी पता लगा सकती थी कि किन-किन नक्सलियों के  संपर्क रामवृक्ष से थे, जो जवाहर बाग के अंदर कथित सत्याग्रहियों को हथियार बनाने और मुकाबला करने की ट्रेनिंग दे रहे थे। पुलिस प्रशासन का इस ओर ध्यान न देना या जानबूझकर अनदेखी करना भी इस बात का बड़ा संकेत है कि रामवृक्ष यादव का राजनीतिक रसूख कितना गहरा था।

अब बात करते हैं आईटी सेल की..., सभी अधिकारी रामवृक्ष यादव के मोबाइल नंबर से भली भांति वाकिफ थे, स्थानीय खुफिया इकाई द्वारा दी गई रिपोर्ट में उन्हें भली-भांति पता था कि जवाहर बाग में चंदन बोस और उसकी पत्नी द्वारा आईटी सेल का संचालन किया जा रहा था और दोनों ही फेसबुक और व्हाटसप के माध्यम से न सिर्फ लोगों को जोड़ रहे थे बल्कि 'विधिक सत्याग्रह' का प्रचार भी किया जा रहा था। आला अधिकारियों द्वारा आईटी सेल के माध्यम से यह जानने की कोशिश भी नहीं गई कि आखिर तथाकथित सत्याग्रहियों की मंशा  और 'मूवमेन्ट' क्या है...। यदि इस ओर गहनता से ध्यान दिया जाता तो शायद दोनों पुलिस अधिकारियों की जान बच सकती थी। इसका  एक उदाहरण है, 'फ्लैग सत्याग्रह जवाहर बाग' (https://www.facebook.com/flagsatyagrah.jawaharbagh.5) नाम से बनाया गया  फेसबुक पेज। इस फेसबुक पेज से सूचनाओं का आदान प्रदान किया जा रहा थ। इस फेसबुक पेज में एसपी सिटी पर हुए जानलेवा हमले से  लगभग आधा घण्टा पूर्व यानी 2 जून को 4 बजकर 28 मिनट पर तथाकथित सत्याग्रहियों द्वारा आक्रामक पोस्ट डाली गई जिसमें कहा गया  कि 'ब्रिटिश इंडियन गवरमेन्ट के कुत्तों, भारत भूमि नेता सुभाष चंद्र बोस की है', इस पोस्ट में मीडियाकर्मियों के 'डीएनए की जांच' की  बात के साथ-साथ उन्हें 'जयचंद की औलाद' भी कहा गया। इस पोस्ट में सभी को 'ब्रिटिश महारानी के पालतू कुत्ते' होने की संज्ञा भी दी  गई। 2 जून की शाम 4 बजकर 28 मिनट पर डाली गई यह पोस्ट आखिरी थी। यदि आईटी सेल इस ओर गंभीरता से ध्यान देता और बराबर  इसपर नजर रखता तो तथाकथित सत्याग्रहियों के इरादों और उनकी आक्रामकता के बारे में वे और ज्यादा जान सकते थे।  अब सवाल यह उठ रहा है कि इन संसाधनों के माध्यम से अपराधियों को पकड़कर अपनी पीठ ठोकने वाले पुलिस विभाग ने आतंक का पर्याय बन चुके रामवृक्ष यादव और उनके गुर्गो के घेरने के लिए इन उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग तक क्यों नहीं किया..? ऐसी क्या मजबूरी  थी जो इस ओर से पुलिस विभाग आंख मूंदे रहा..? ये वे सवाल हैं जो कुछ और ही इशारा करते नजर आते हैं और इन इशारों को समझने  वाले भी चुप्पी साधे हुए हैं।


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