महामना पर कांग्रेस के आरोप निराधार - डाॅ0 शर्मा

सोनिया गाँधी माँगे भूल पर माफ़ी

आज़ादी के 67 वर्षों बाद भारत रत्न से नवाजे गये महामना मदन मोहन मालवीय पर कांग्रेस द्वारा लगाये गये धर्मांतरण के आरोप को लेकर डाॅ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में रोष व्यक्त किया गया।

संस्थापक अध्यक्ष डाॅ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने गणेश धाम कालोनी स्थित संस्थान में रविवार को बैठक में आरोप के प्रतिवाद में कहा कांग्रेस महामना द्वारा छुआछूत के खिलाफ किये गये समाज सुधार के कार्याें अज्ञानतावश धर्मांतरण समझ रही है। उदाहरण दिया कि अछूत के घर भोजन करने से समाज से बहिष्कृत हुए राजा महेन्द्र प्रताप को महामना ने ही वृन्दावन की खुली सभा में रूढि़वादियों को शास्त्रार्थ की चुनौती देकर वापस समाज में स्थान दिलाया था। ऐसी ही अन्य बुराइयों के विरोध में भी महामना ने शंकराचार्य तक से टक्कर लेकर सामाजिक सुधार किये जिससे उन पर रूढि़वादी ंिहंदुओं द्वारा जानलेवा हमले भी कराये गये। आगे कहा कि 20वीं सदी के प्रारम्भिक दौर में अंग्रेजों की कूटनीति के चलते छुआछूत के मसले पर हिंदू समाज बिखर गया होता, यदि महामना और महात्मा गाँधी ने मिलकर अछूतों को गले नहीं लगाया होता। पूना पैक्ट से पहले महामना ने ही अंबेडकर के आगे झोली फैलाकर महात्मा गाँधी के प्राणों की भीख माँगी थी। महामना का यह कार्य हिंदू महासभा द्वारा भी चलता रहा जब वह उसके अध्यक्ष थे। फिर जब महासभा रास्ते से भटकने लगी तो महामना ने उसे कांग्रेस की तरह छोड़ दिया। महामना के समाज सुधारों और निःस्वार्थ सेवा भाव ने मोहम्मद अली जिन्ना तक को प्रभावित किया। जिन्ना महामना द्वारा स्थापित इंडियन नेशनल पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। कहा कि यदि स्वाधीनता आंदोलन की बागडोर महामना के हाथों में रहती तो आज देश का नक्शा ही कुछ और होता।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की भ्रांतियों को लेकर डाॅ0 शर्मा ने खुलासा किया कि महामना ने अपने जीवन काल में ही जाहिर कर दिया था कि ‘हिंदू’ शब्द भौगोलिक अर्थ में लिया गया है क्योंकि इससे विश्व ने भारतीयों को जो नाम दिया है, उसकी मर्यादा और सांस्कृति प्रतिध्वनित होती है।

इसी क्रम में प्रो0 धर्मचंद विद्यालंकार ने कहा कि महामना ने जीवन में राज्य, स्वर्ग और मोक्ष को किनारे रख प्रणियों के दुःख दूर करने का संकल्प उठाया था। इसलिए उन्होंने न तो कोई आत्मकथा लिखी और न ही उपब्धियों का बखान किया। जिसका नतीजा यह हुआ कि 1946 में उनके न रहने पर अवसरवादी तत्व महामना की उपलब्धियों का फायदा उठाते रहे और उन्हें 67 वर्षों तक अपने ही देश में भुलाया जाता रहा। यहाँ तक कि उत्तरदायी संस्था बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने भी महामना वांङमय प्रकाशन की जहमत नहीं उठाई। प्रो0 विद्यालंकार ने प्रधानमंत्री से महामना पर फिल्म निर्माण, वांङमय प्रकाशन और प्राथमिक शैक्षिक पाठ्यक्रम निर्धारित करने की माँग की।

अगले क्रम में सेवक शरण ने रोष जताया कि कांग्रेस को शायद यह मालूम नहीं है कि जब वह 1885 में पैदा हुई थी, तब उसे महामना ने ही पालने में झुलाया था, कुछ बड़ी होने पर उसे उँगली पकड़कर चलना भी सिखाया था और जवान होने पर उसकी भटकन देखकर उससे दूर भी हुए, फिर जब ठोकर खाकर लौटी तो उसे पुनः स्नेह दिया। वही कांग्रेस आज अज्ञानवश महामना पर उँगली उठा रही है।

समापन पर वक्ताओं ने महामना पर अनर्गल बयान देने के आरोप में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से माफी माँगने दोषियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की माँग की।

इस अवसर पर रमेश कुमार, राकेश, मोहन शर्मा, रवीन्द्रनाथ आदि उपस्थित थे।       


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