रानी की वाव : सीढ़ी वाले कुएं की रानी

मनीष देसाई

 

नई दिल्ली : हाल की गुजरात यात्रा में अहमदाबाद में मेरे पास एक दिन का खाली समय था और मैं इसका बेहतर इस्तेमाल करना चाहता था। मेरे सहयोगी जगदीश भाई ने सुझाव दिया कि एक दिन में पाटन स्थित रानी की वाव तथा मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर देखा जा सकता है। उनके सुझाव पर कोई दो राय नहीं थी। मैंने रानी की वाव के बारे में पढ़ रखा था और एनडीटीवी की भारत की आश्चर्य श्रृंखला धारावाहिक में रानी की वाव के बारे में देख रखा था। गूगल पर खोज में यह जाहिर हुआ कि भारत सरकार ने यूनेस्को की विश्व विरासत स्थलों में रानी की वाव को शामिल करने का अनुरोध किया है। टेलीविजन पर भी गुजरात पर्यटन के 'खुशबू गुजरात की' अभियान में अमिताभ बच्चन ने रानी की वाव का प्रचार प्रसार किया।

 

दो घंटे के सफर में कलोल, ऊंझा तथा मेहसाणा होते हुए हम पाटन शहर पहुंचे। पाटन कभी गुजरात की राजधानी होता था। सूर्य की लुकाछिपी के बीच हम बड़े मैदान पर पहुंचे, जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक पट्टिका लगी थी, जहां वाव में जाने के रास्ते बताए गए थे।

 

रानी की वाव 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी तथा 27 मीटर गहरी है। मूल रुप से इसे सात मंजिला बनाया गया था, लेकिन अब हम यह पांच मंजिला ही है। रानी की वाम की सीढ़ियों से नीचे उतरते ही अपने आपको एक अलग दुनिया में पाया। अगला एक घंटा तो बिलकुल वरदान था।

 

यह सुसज्जित इमारत है और इसमें मारु-गुर्जर शैली की वास्तुकाल है। अधिकतर मूर्तिकलाओं में विष्णु भक्ति दशावतार रुप में दिखती है। इसमें वराह, नरसिंह, राम तथा कलकी की तस्वीरें हैं। इसमें महिषासूर मर्दनी द्वारा राक्षस महिषासूर का बध करते दिखाया गया है। रानी की वाव में अप्सरा का भी चित्र है और इसमें 16 प्रकार के श्रृंगार दिखाए गए हैं। जल स्तर के निकट शेरषाशयी विष्णु की भी तस्वीर हैं।

 

2001 तक सैलानी वाव में नीचे जल तक जा सकते थे, लेकिन भुज में आए भूकंप के दौरान ढ़ांचे में कमजोरी आ गई और अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक सीमा तक ही प्रवेश की अनुमति दे ऱखी है, लेकिन इससे पत्थर में समाए लय, सुंदरता तथा भाव को आप देख सकते हैं।

 

इस स्थल को देखते ही यह याद आता है कि हमारे पूर्वजों ने जल को कितना पवित्र माना था। इन्हें मूल रुप से साधारण कुंड के रुप में बनाया गया था। लेकिन इसे बाद के वर्षों में जल की पवित्रता से जोड़ते हुए विकसित किया गया।

 

वैसे तो अनेक राजाओं द्वारा रानियों की याद में स्थल बनाए गए, लेकिन रानी की वाव कुछ अलग है। माना जाता है कि इसे रानी उदयमति ने अपने पति भीमदेव-1 की स्मृति में बनवाया। भीमदेव-1 पाटन के सोलंकी वंश के संस्थापक थे। 1304एडी में मेरुंग सूरी की रचना 'प्रबंध चिंतामणि' में भीमदेव-1 की स्मृति में उदयमति द्वारा बनाए गए स्थलों का वर्णन है। बाद में इसमें सरस्वती नदी का पानी आ गया और 1960 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी खुदाई की। अनुमान लगाया जाता है कि वाव में आठ सौ मूर्तिकलाएं थीं, इनमें से पांच सौ कलाएं पुरानी स्थिति में हैं।

 

यह संरक्षित स्थल है और इसमें अच्छे कार्यों के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सराहना करनी चाहिए। संरक्षण प्रयासों के अतिरिक्त एएसआई ने स्कॉटलैंड की सहायता से वाव का डिजिटल नक्शा तैयार किया है। इससे इसकी बेहतर समझदारी और संरक्षण में मदद मिलेगी।

 

रानी की वाव गुजरात का गौरव रहा है। 2012 में बडोदरा सर्किल के पूर्व पुरातत्व अधीक्षक केसी नौरियाल की अगुवाई में एएसआई के एक दल ने यूनेस्को की मंजूरी के लिए खाका तैयार किया। चीन के तीसूंग्गा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर झांग झी के नेतृत्व में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति का सलाहकार दल पाटन आया और स्थल का व्यापक अध्ययन किया। इस दल ने स्थानीय लोगों से भी बातचीत की और जाना कि रानी की वाव उनके लिए किस महत्व का है।

 

अंत: 22 जून, 2014 को यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने दोहा में अपनी 38वीं बैठक में रानी की वाव को विश्व विरासत स्थल का दर्जा दिया। यूनेस्को ने टिप्पणी की कि सीढ़ियों वाले कुएं भूमिगत जल स्रोत के विचित्र प्रकार हैं और इन्हें तीन हजार ईसा पूर्व से ही बनाया जाता रहा।

 

रानी की वाव को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल करने के चंद मिनटों के अंदर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट किया 'यह हमारे लिए गौरव की बात है, जब आप अगली बार गुजरात जाएं तो हमारी महान कला और संस्कृति की प्रतीक रानी की वाव देखने जरुर जाएं।'

 

निश्चित रुप से जब आप रानी की वाव से बाहर आते हैं तो आप कुओं के बारे में अपने साथ नई समझदारी लाते हैं। यह कि कुएं हमेशा अंधेरे, गहरे और रहस्यपूर्ण नहीं होते। रानी की वाव 11वीं शताब्दी की सोलंकी कला का बेहतरीन नमूना है।

 

 

लेखक मुंबई में निदेशक {संचार} हैं।


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