लोक संस्कृति की उपेक्षा से बिगड़ता सांस्कृतिक परिदृश्य

हिन्दुस्तान काॅलेज में परिचर्चा संगोष्ठी

हिन्दुस्तान काॅलेज आॅफ साइंस एन्ड टैक्नोलोजी में आयोजित ’बिगड़ता सांस्कृतिक परिदृश्यः दोषी कौन ?’ विषयक परिचर्चा संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष और ब्रज लोक संस्कृति मर्मज्ञ मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा कि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि लोक संस्कृति की उपेक्षा से सांस्कृतिक परिदृश्य बिगड़ चुका है और बिगड़ता जा रहा है किन्तु अभी भी इसे बचाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक परिदृश्य हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ है और संस्कृति संस्कारों पर आधारित होती है। यह चिन्ता और चिन्तन का विशय है कि पाश्चात्य एवं फिल्म संस्कृति के प्रहारों से प्रभावित हो रही हमारी प्राचीन संस्कृति को किस प्रकार संरक्षित किया जाय।

उन्होंने आगे कहा कि संस्कृति के मूल स्थल ग्रामीण अंचलों में ब्रजभाषा के स्थान पर अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी, लहँगा-फरिया - ओढ़नी के स्थान पर सलवार सूट, मांगलिक संस्कारों के अवसर पर गायें जाने वाले लोकगीतों के स्थान पर फिल्मी गीत और लोकनृत्यों के स्थान पर भौंड़े नृत्यों का प्रचलन बढ़ रहा है। चैपाल पर रात-रात भर रामायण - महाभारत की कथाएँ सुनाते जिकड़ी-सम्वादी भजन, चिकाड़े पर लहराता नल-दमयन्ती का ढोला और लोकवाद्य अलगोजा की टीप अब सुनने को नहीं मिलती। गाँव के पनघट सूने हो गये हैं। लोकवाद्य बम्म और ढोलक फट जाय तो अब मढ़ नहीं पाती हैं।

मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा कि केबड़े की महक के समान महकते संयुक्त परिवार बिखरते जा रहे हैं। हरियल बाग और अमराइयाँ नष्ट हो जाने के कारण झूलों पर मल्हारें नहीं गूँज रही हैं। करवा चैथ और अहोई का दीवालों पर महिलाएँ चित्रांकन नहीं करती हैं, उनके चित्र टँग जाते हैं। लोककला का उत्कृष्ट उदाहरण साँझी नई पीढ़ी से दूर है। बगीची - अखाड़े अतीत का अध्याय बन गये हैं।

उन्होंने कहा कि बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य के बिगड़ते स्वरूप के लिए वे दोषी हैं जिन्हांेने शिक्षा को संस्कारों से दूर कर दिया है और शासन की वे नीतियाँ दोषी हैं जो फिल्म तथा टीवी चैनल्स के अश्लील दृश्यों के प्रसारण में नियंत्रण नहीं लगा पा रही हैं। केन्द्र स्तर पर बदलाव के आसार हुए हैं परन्तु आवश्यकता है कि राजनैतिक सुधारों के साथ सांस्कृतिक उन्नयन के लिए भी प्रबुद्ध विचारक जागृत हों।

संगोष्ठी में सुप्रसिद्ध कवि सोम ठाकुर ने कहा कि हम संस्कृति को बदल नहीं सकते हैं जब कि सभ्यता वेशभूषा की तरह है जिसे जब चाहे बदला जा सकता है। इस अवसर पर ब्रजभाषा के ख्याति प्राप्त कवि श्याम सुन्दर शर्मा ’अंकिचन’ ने माधुर्यमयी कविताओं द्वारा रसवृश्टि के साथ वर्तमान सामाजिक - सांस्कृतिक परिदृश्य को - ’कोई दिल से नहीं मिलता, किसी से दिल नहीं मिलता’ कविता से साकार किया।

संगोष्ठी का संचालन एव ंविशय प्रर्वतन करते हुए प्रो0 सुबोध कुमार दुबे ने चार सांस्कृतिक क्रान्तियों की व्याख्या की और कहा कि इन्जीनियरिंग काॅलेज के छात्र - छात्राओं के लिए तकनीकी शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति का ज्ञानवर्धन भी आवष्यक है।

संस्थान के निदेशक डा0 राजीव कुमार उपाध्याय ने संगोश्ठी में कहा कि सांस्कृतिक परिदृश्य को विकृतियों से बचाये जाने की अनिवार्य आवश्यकता है।

अन्त में अधिशासी निदेशक प्रो0 वी0 के0 शर्मा, प्रो0 सुबोध कुमार दुबे तथा डा0 राजीव कुमार उपाध्याय ने मोहन स्वरूप भाटिया , सोम ठाकुर तथा श्याम सुन्दर शर्मा ’अंकिचन’ को उत्तरीय उढ़ाकर एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया और डीन स्टुडैन्ट वेलफेयर संदीप अग्रवाल ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

इस अवसर पर डा0 आर0 के0 तिवारी, डा0 वी0 के0 गुप्ता, डा0 पुनीत, डा0 चन्द्रनाथ त्रिपाठी सहित छात्र- छात्राएँ बड़ी संख्या में उपस्थित थे।


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