वात्सल्य ग्राम में बिखरा होली का रस-रंग

   

कृश्ण के स्वरूप ने दीदी माँ में किए जसोदा मैया के दर्षन

मथुरा-वृन्दावन मार्ग स्थित साध्वी ऋतंभरा जी के वात्सल्य ग्राम में होलिका -दहन के पष्चात् विषाल परिसर सांस्कृतिक सुरभि से महक उठा और चारों ओर होली का रस - रंग बिखर गया।

वात्सल्य ग्राम के मुक्ताकाषीय मंच पर इन्द्रधनुशी रंगों की छटा विहँस रही थी। दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा जी और देष - विदेष से आये श्रद्धालु असत्य पर सत्य के विजय पर्व होली के हर्शोल्लास से अभिभूत थे।

मुक्ताकाषीय मंच पर होली सांस्कृतिक कार्यक्रम के प्रारंभ में वात्सल्य ग्राम के मीडिया प्रभारी सुप्रसिद्ध कवि उमाषंकर राही ने संविद गुरुकुलम् तथा वात्सल्य ग्राम के अन्तर्गत संचालित संस्थाओं द्वारा संस्कारयुक्त षिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में की जा रही सेवाओं का परिचय दिया।

कार्यक्रम का षुभारम्भ सांस्कृतिक कार्यक्रम की निर्देषक अन्तर्राश्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार और कोरियोग्राफर श्रीमती वन्दना सिंह द्वारा साध्वी दीदी माँ ऋतंभरा जी का आषीर्वाद प्राप्त कर ठाकुर बाँके विहारी की झाँकी और द्वारा जलते दीपकों की थाली हाथ में लिए स्तुति - गायन से हुआ और अगले चरण में यमुना मैया की वन्दना प्रस्तुत की गई।

राधिका गोरी से बिरज की छोरी से 

कार्यक्रम का अगला दृष्य था जिसमें नटखट बाल  कृश्ण मैया जसोदा से मनुहार कर रहे थे-

मैया कराइ दै मेरौ ब्याहु राधिका गोरी से, बिरज की छोरी से

जसोदा मैया से मनुहार करते -करते बाल कृश्ण के स्वरूप स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से मंच से उतर कर दीदी माँ की गोद में आकर बैठ गये और उनसे विवाह कराने की मनुहार करने लगे। दीदी माँ ने भाव - विभोर हो बाल-कलाकार को अंक में भर लिया।

इसी श्रृंखला में बरसाना-नन्दगाँव की लठमार होली और ब्रज गोपिकाओं द्वारा कृश्ण को ’नर ते स्याम बनाई दिये नारी’ के दृष्यों ने दर्षकों को आनन्दित कर दिया।

कार्यक्रम में ’जेहर नृत्य’ आदि राधा-कृश्ण की अनेक माधुर्यमयी लीलाओं के अनन्तर बरसाने की मोर कुटी पर राधा को रिझाने के लिए कृश्ण द्वारा मोर बनकर किये नृत्य की कलाकारों ने मयूर-नृत्य के रूप में प्रस्तुति की तो वात्सल्य ग्राम मोर की कुहुक के साथ दर्षकों की तालियों से गूँजता रहा।

’मयूर नृत्य’ की प्रस्तुति ने जहाँ दर्षकों को मंत्रमुग्ध कर दिया वहीं 108 दीपकों से जगमगाते चरकुला नृत्य ने कलाकार के कला-कौषल से आष्चर्यचकित कर दिया। मनों बजनी चरकुला सिर पर रखकर, दोनों हाथ छोड़कर स्वर - ताल पर कुमारी रीना ने नृत्य किया तो दर्षकों ने तालियाँ बजाकर प्रोत्साहित किया।

कार्यक्रम का समापन राधा - कृश्ण की फूलों की होली से हुआ जिसमें कृश्ण ने राधा को विभिन्न रंगों के पुश्पों से ढक दिया और जब राधा की सखियों और कृश्ण के सखाओं ने परस्पर पुश्प वर्शा को तो इन्द्रधनुशी छटा बिखर उठी। दीदी माँ इस दिव्य - अलौकिक दृष्य से भक्ति - विभोर हो मंच पर आईं और उन्होंने राधा - कृश्ण पर फूलों की वर्शा की। इसके साथ ही देष - विदेष से आये भक्तजनों ने भी फूल बरसा कर आनन्द की अनुभूति की।

कार्यक्रम संयोजक थे उŸार प्रदेष संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया।

इस अवसर पर मुख्य रूप से स्वामी नित्यानन्द महाराज, संजय भैया, ललित मिŸाल, ए0 के0 राय, साध्वी स्वरूप दीदी सहित देष के विभिन्न स्थानों से आये भक्तजन उपस्थित थे।


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