विद्यालयों में विद्या की देवी सरस्वती की पूजा - अर्चना नहीं

सूनी वसन्त पंचमी:

भारतीय संस्कृति में विद्या और वाणी की अधिश्ठात्री देवी के रूप में सरस्वती की मान्यता है। विद्यालयों में वर्श भर में केवल एक दिन सरस्वती जी के प्राकट्य दिवस वसन्त पंचमी पर विद्यार्थियों द्वारा सरस्वती जी की वन्दना एवं पूजा - अर्चना कर विद्या का वरदान प्राप्त किया जाता है।

 उŸार प्रदेष षासन द्वारा इस वर्श बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर के जन्म दिवस को सरस्वती जी के जन्म दिवस से अधिक वरीयता दिये जाने के कारण सार्वजनिक अवकाष घोशित किये जाने पर अधिकांष विद्यालय बन्द रहे और छात्र-छात्राओं द्वारा सरस्वती जी की पूजा - अर्चना नहीं हो सकी। ज्ञानदीप के सचिव मोहन स्वरूप भाटिया, षैक्षिक निदेषक के.जी. माहेष्वरी, श्रीमती प्रेमा भाटिया तथा प्रषासनिक अधिकारी आषीश भाटिया ने विद्यालय परिसर में स्थित सरस्वती प्रतिमा की पूजा-अर्चना की।

ज्ञानदीप षिक्षा भारती के सचिव मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा है कि 46 वर्शों में यह पहला अवसर था जब कि ज्ञानदीप में वसन्त पंचमी पर छात्र - छात्राओं  द्वारा विद्यालय में ’या कुन्देन्दुु तुशारहार धवला या षुभ्र वस्त्रावृता’ के स्वर गूँजे और न ही - ’ष्यामा ष्याम सलोनी सूरत कौ सिंगार बसन्ती ऐ’ रसिया - गीत पर लोक नृत्य से वासन्ती वातावरण का आनन्द छाया।

उन्होंने कहा कि राजनैतिक कारणों से की गई छुट्टियों से अकारण विद्यार्थियों की पढ़ाई की क्षति होती है। उŸार प्रदेष के पूर्व मुख्य मंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त, डा0 सम्पूर्णानन्द, कमलापति त्रिपाठी आदि के जन्म दिवस पर छुट्टियाँ नही होती हंै। नेताजी सुभाश चन्द्र बोस जैसे महान् क्रान्तिकारी के जन्म-दिन पर छुट्टी नहीं होती है। देष के किसी भी महापुरुश के जन्म दिन पर छुट्टी करने की अपेक्षा विद्यालयों में उनके योगदान से विद्यार्थियों को परिचित कराना सार्थक हो सकता है।

 

 


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