आम लोग साठ साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बुनियादी जरूरतों और सुविधाओं से वंचित हैं। रोटी, कपड़ा और मकान आज भी एक सपना है। महंगाई, भ्रष्टाचार नित नए रिकॉर्ड को छू रहे हैं। हिंसा, आतंकवाद, भय और भूख है... क्या यही गणतंत्र होने का सुख है? आज हमारे मंत्री, नेता, सरकारें समस्याओं का निदान न खोज पाने की स्थिति में यह कहने का साहस रखते हैं कि हम महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं!

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