सिनेमा सरोकार, संस्कृति और हिंद सिने जनक दादा साहब फाल्के

Dada Saheb Phalkeअभिनय मनुष्य जीवन की प्रारंभिक गतिविधि है। दूसरों की नकल उतारने का अभिनय करता बच्चा... कितना कुछ सीख जाता है और अभिनय सीखने का माध्यम बन जाता है। अभिनय आनंद है, हंसना है, हंसाना है, रुलाना है, खो जाना है। एक अच्छा अभिनय झूठ को सच बना सकता है। सत्य की मजबूत दीवार को भरभराकर गिरा सकता है। अभिनय कला है। कभी-कभी अभिनय जीवन बन जाता है। कलाकार जिंदगी के अद्भुत रंगों में डूबते-उतराते रहते हैं। कभी कोई, कभी कुछ, तो कभी आप और हम बन जाते हैं। फिल्मी पर्दे पर छाये किरदारों संग हम बह जाते हैं। अभिनेताओं-अभिनेत्रियों में अपना अक्स तलाशते हैं। दूसरों को ढूंढते हैं।

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