
फिर देश को नहीं मिला नेहरू सा नेतृत्व
हिटलर समेत मुसोलिनी का ठुकराया आमंत्रण

मथुरा, मानवीय मूल्यों और प्रजातंत्र की बुनियाद पर विश्व शांति के ध्वजवाहक भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू सा नेतृत्व देश को दुबारा नसीब न हो सका। ये विचार मंगलवार को पण्डित जवाहरलाल नेहरू की 50 वीं पुण्यतिथि पर डाॅ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में संस्थापक अध्यक्ष डाॅ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने ‘मथुरा और कश्मीर’ शोध परियोजना के तहत प्रकाश में आये नेहरूओं के माथुरी संबंधों को लेकर विश्रामघाट क्षेत्र में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में व्यक्त किये।
डाॅ0 शर्मा ने कहा कि गांधी - नेहरू युग में वैश्विक नेतृत्व को लेकर पूरे विश्व में रह - रहकर यह सवाल उठाया जा रहा था कि भारत में गांधी के बाद कौन और नेहरू के बाद कौन ? वह सवाल आज भी अपनी जगह पर क़ायम है। और विश्व के मार्गदर्शन के लिए दुनिया की निगाहें अभी भी भारत पर लगी हैं।
बताया कि यद्यपि इन्दिरा जी के दौर में कभी-कभी ऐसा जरूर लगने लगा था कि जैसे गांधी, नेहरू युग की पुनर्वापसी हो रही हो। और बांग्लादेश के अभ्युदय 16 दिसम्बर 1971, ने उन्हें एक बार गांधी, नेहरू के समकक्ष खड़े होने का मौका भी दे दिया था। मगर 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच 21 महीने तक चले आपातकाल और 1977 में छठी लोकसभा के चुनाव में करारी हार ने उनकी विश्वस्तरीय छवि को गहरा आघात पहुंचाया। उसके बाद समय ने एक बार फिर करवट ली और 1980 में सातवीं लोकसभा में ऐतिहासिक विजय के बाद इन्दिरा जी के स्वर्णिम युग की पुनः शुरूआत हुई। मगर इससे पहले कि वह विश्वपटल पर गांधी नेहरू के समकक्ष अपना नाम दर्ज करा पाती, 31 अक्तूबर 1984 को उनकी नृशंस हत्या ने विश्व के सवालों का जवाब नहीं देने दिया। इन्दिरा जी के भीष्मी बलिदान ने एक माने में उन्हें विश्व में बेहद लोकप्रिय तो बना दिया, मगर उनके जरिये विश्व को गांधी, नेहरू की तरह मिलने वाले बहुमुखी योगदान अछूते रह गये। उसके बाद देश के राजनीतिक क्षेत्र में जो शून्यता आई, फिर उसने निकलने का नाम नहीं लिया और भारत संकीर्णताओं की राजनीति में उलझकर वैश्विक साख गवांता चला गया।
डाॅ0 शर्मा ने दस्तावेजों के हवाले बताया कि पण्डित जी का व्यक्तित्व और कृतित्व एक दूसरे के पूरक थे। कई बार तो मुश्किलें उनके होने मात्र से आसान हो जाती थीं, तो कई बार कुछ करने से। ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री बनने से पूर्व जब पण्डित जी देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। उसी दौर में 26 मई 1938 को उनके यूरोप जाने से पूर्व जर्मनी की नाजी सरकार ने उन्हें म्युनिख में बतौर विशिष्ट अतिथि आमंत्रित किया था। मगर प्रजातांत्रिक मूल्यों के मद्दे नज़र उन्होंने हिटलर व मुसोलिनी के संयुक्त आमंत्रण को ठुकरा कर भारत के गौरव और लोकतांत्रिक मर्यादा की रक्षा की थी। नेहरू के इस स्वाभिमान ने दोनों तानाशाहों को हैरत में डाल दिया और इस निर्णय का असर पूरे विश्व पर देखा गया। महात्मा गांधी ने तो ख्ौर बहुत पहले ही 1931 में द्वितीय गोलमेज वार्ता से लौटते वक्त रोम में प्रवास के दौरान मिलने आये मुसोलिनी से साफ कह दिया था कि तुम्हारे मंसूबे सिर्फ ताश के पŸाों का महल साबित होंगे।
डाॅ0 शर्मा ने पण्डित जी के कृतित्व का ख़ुलासा करते हुए बताया कि पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने कभी जनता के शोषक पूंजीपतियों के आगे घुटने नहीं टेके। कारण कि समाजवाद के प्रभाव में उनकी यह धारणा मज़बूत हो चुकी थी कि पूंजीवाद मेहनत तो कुछ नहींे करता लेकिन वह पूंजी का मकड़जाल फैलाकर सरकार और जनता दोनों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करता है। यहां तक कि 1936 में जब उन्हें बीमार पत्नी कमला नेहरू के विदेश में इलाज के लिए धन की बहुत जरूरत थी। उनके निकट के सहयोगियों ने बिड़ला और दूसरे पूंजीपतियों से धन मांगने का परामर्श दिया। पण्डित जी ने उस कठिन समय में भी पूंजीपतियोें से धन नहीं मांगा और जैसे-तैसे कमला नेहरू के इलाज की व्यवस्था की थी।
इसी म में डाॅ0 शर्मा ने बताया कि एक बार पण्डित जी को जब मोहम्मद यूनुस के जरिये यह पता चला कि बिड़ला के खाते से राजनीतिज्ञों को दी जाने वाली आर्थिक मदद में विजयलक्ष्मी पण्डित का भी नाम है , तो उन्होंने उसी दिन से उनसे दूरियां बना लीं जिसका कारण विजयलक्ष्मी भी समझ न सकीं।
अगले क्रम में उन्होंने पण्डित जी की देशभक्ति का दृष्टान्त देकर बताया कि एक बार टाटा ने किसी तर्कीब से देश को मिलने वाले 75 लाख रूपये का टैक्स बचा लिया। इसकी सूचना टाटा के ही किसी सेवाकर्मी ने पण्डित जी को दे दी। पण्डित जी ने इस बात का इतना बुरा माना कि टाटा ने कार्रवाई के डर से सारा टैक्स सरकारी ख्ाजाने में जमा करा दिया।
इससे पूर्व उपस्थितों ने मां यमुना और पण्डित जवाहरलाल नेहरू के चित्रपटों पर माल्यार्पण एवं दीपोपहार से सभा की शुरूआत की। तत्पश्चात् पण्डित भारत माता की जय, जवाहरलाल नेहरू अमर रहें, के नारों से क्षेत्र आयोजन स्थल गूंज उठा।
इस अवसर पर मंसोला जी, भानू चैबे, कमली, बसन्तलाल मुखिया, ढोले, राजकुमार, विश्वनाथ पण्डित, राजेन्द्र प्रसाद चतु0, ब्रजेन्द्रनाथ एड0, शुभम् चतु0 आदि उपस्थित थे।






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