आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और उनकी कार की रफ्तार

उन दिनों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी शांति निकेतन में थे। उस समय उनके पास एक कार भी थी। मगर वह उसे बहुत धीमे चलाते थे। उसकी चाल इतनी धीमी होती कि साथ में बैठने वाले की तबीयत ऊब जाती थी। फिर भी द्विवेदी जी अपने आगंतुकों को अपनी गाड़ी से सैर जरूर कराते थे।

एक बार का वाकया है। सुप्रसिद्ध हिन्दी लेखक यशपाल जैन उनसे मिलने गए। दो-तीन दिन के बाद जब वह दिल्ली लौटने को हुए तो उन्होंने अपना सामान जल्दी-जल्दी पैक करना शुरू कर दिया।

द्विवेदी जी ने उन्हें हड़बड़ी में देखकर कहा कि अरे भाई यशपाल, आराम से सामान बांधो, इतनी जल्दी भी क्या? और फिर तुम्हें चिंता किस बात की, मैं तुम्हें स्टेशन तक अपनी गाड़ी से छोड़ दूंगा।

यह प्रस्ताव सुनकर यशपाल की हालत खराब हो गई, फिर भी उन्होंने विनम्रता से कहा कि पंडितजी, गाड़ी छूटने का समय होने वाला है। मैं हर हालत में आज दिल्ली पहुंचना चाहता हूं, अत: किसी भी कीमत पर अपनी गाड़ी छोड़ नहीं सकता, कृपया क्षमा करें। मैं पैदल ही चला जाता हूं। और, उन्होंने पैदल ही स्टेशन की राह ली।

*********

उन दिनों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी काशी विश्वविद्यालय में रेक्टर के पद पर थे। एक दिन कुछ विद्यार्थियों ने उनसे अपनी किसी मांग को लेकर उन्हें घेर लिया और  अपनी बात मनवाने के लिए जोरदार प्रदर्शन करने लगे। कुछ छात्रों ने भारी शोरगुल भी करना शुरू कर दिया।

द्विवेदी ने सबको शांत करते हुए अपना संक्षिप्त सा वक्तव्य दिया और अंत में कहा कि तुम सबने बिना किसी वजह के मेरी अवमानना की है। अत: मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम में से हर कोई इस जन्म में अथवा अगले जन्म में किसी न किसी विश्वविद्यालय का वाइस चान्सलर जरूर बने।

यह सुनते ही सभी छात्र जोरों से हंस पड़े और देखते ही देखते तनाव का माहौल पूरी तरह खत्म हो गया। सभी छात्रों ने अपनी गलती मानी और आचार्य द्विवेदी ने क्षमादान करके सबको खुशी-खुशी विदा कर दिया।