अमेरिका में सपने टूटे, भारत में मिली कहानी…

अमेरिका सपनों की धरती है। कम-से-कम विज्ञापन यही कहते हैं। वहां सपने डॉलर में आते हैं और कभी-कभी उनकी ईएमआई जिंदगीभर चुकानी पड़ती है।

संतोष नायर भी सपने लेकर अमेरिका गए थे। लेकिन, जिंदगी ने उन्हें ऐसा पैकेज थमा दिया, जिसमें सफलता के साथ बीमारी, शराब, टूटते रिश्ते, अदालत, जेल और आखिर में भारत वापसी भी शामिल थी। कहानी में इतना मसाला है कि बॉलीवुड की कोई पटकथा पढ़कर भी कह सकती है कि भाई, थोड़ा कम करो! लेकिन यह फिल्म नहीं, एक असली जिंदगी थी। और, असली जिंदगी की पटकथा सबसे ज्यादा निर्दयी होती है।

अंग्रेजी में पढ़ें : When American Dream went wrong, India found the story...

संतोष नायर को आखिरकार कुछ ठहराव मैसूर में मिला। मगर अंतिम वर्षों में खराब सेहत ने उन्हें फिर घेर लिया। 2024 में उनका निधन हो गया। पीछे रह गई एक अधूरी पांडुलिपि, और एक ऐसी जिंदगी, जिसमें जितने मोड़ थे, उतने शायद किसी हाईवे में भी नहीं होते। यही पांडुलिपि बाद में ‘सिल्वर लाइनिंग्स इन द डार्क स्काई’ बनी।

नायर पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। महत्वाकांक्षी थे। प्रतिभाशाली थे। अमेरिका में बेहतर भविष्य का सपना था। शादी हुई। परिवार बना। पेशेवर सफलता मिली। फिर जिंदगी ने अचानक गियर बदल दिया। बाइपोलर डिसऑर्डर ने उनके जीवन में प्रवेश किया। मानसिक उन्माद के दौर आए। शराब ने मुश्किलों को और उलझाया। रिश्ते कमजोर हुए। गलत फैसले हुए। कानून सामने आया और अंततः जेल की सलाखें भी आ गईं।

तीन शादियां, पारिवारिक तनाव, कभी गजब का आत्मविश्वास और कभी बच्चों जैसी मासूमियत; नायर एक ही व्यक्ति में कई व्यक्तित्वों का चलता-फिरता संस्करण लगते हैं। लेकिन, यही बाइपोलर डिसऑर्डर की पेचीदगी भी है। यह बीमारी सिर्फ मूड बदलने का मामला नहीं है। इसमें व्यक्ति की सोच, ऊर्जा, निर्णय क्षमता और व्यवहार तक प्रभावित हो सकते हैं।

बीमारी के दौरान इंसान को अपने फैसले बिल्कुल सही लग सकते हैं। दिमाग एक्सप्रेस ट्रेन की रफ्तार से दौड़ता है और विवेक बेचारा अगले स्टेशन पर छूट जाता है। फिर जिंदगी बिल भेजती है। रिश्तों का बिल। पैसों का बिल। नौकरी का बिल। परिवार की चिंता का बिल। और, अंत में कानून का बिल, जिसमें ब्याज सबसे ज्यादा होता है।

नायर कई बार दवा लेना भूल जाते थे। इसके बाद उनका व्यवहार बदल जाता था। वह चिड़चिड़े, रूखे या हिंसक हो सकते थे। उनके अनुभव से पता चलता है कि मानसिक बीमारी को समझे बिना केवल व्यवहार को देखना कितना खतरनाक हो सकता है। यही इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

नायर को सिर्फ बाइपोलर डिसऑर्डर वाला व्यक्ति मान लेना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वह बुद्धिमान थे। जिज्ञासु थे। महत्वाकांक्षी थे। उनमें हास्यबोध था। वह अच्छे पेशेवर, पति, पिता, मित्र और प्रवासी भी थे।

बीमारी उनकी कहानी का हिस्सा थी। पूरी कहानी नहीं। यही फर्क इस आत्मकथा को महज बीमारी की कहानी बनने से रोकता है। नायर अपनी जिंदगी को चमकदार पैकेजिंग में बेचने की कोशिश नहीं करते। वह खुद को महान नायक नहीं बनाते हैं। अपनी गलतियों पर पर्दा नहीं डालते। अपनी कमजोरियों को भी सामने रखते हैं। कभी वह बेहद समझदार लगते हैं। कभी लापरवाह। कभी अजीब। कभी बेहद मासूम। और, कई बार इतने मजेदार कि पाठक सोचता है, यह आदमी अपनी जिंदगी का दुख भी स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल सकता था।

आम आदमी कॉलेज से डिग्री लेकर निकलता है। नायर जेल से अनुभव लेकर निकले। जिंदगी ने उन्हें शायद गलत जगह दाखिला दिया था, लेकिन उन्होंने वहां भी नोट्स बना लिए। हंसी के पीछे हालांकि दर्द बहुत गहरा है।

नायर के जेल अनुभव अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर असहज सवाल उठाते हैं। मानसिक बीमारी से जूझता व्यक्ति जब कानून के सामने आता है, तो क्या सिस्टम उसके मन को समझता है या सिर्फ उसके व्यवहार को सजा देता है? सवाल आसान हैं। जवाब नहीं। बीमारी कब व्यवहार बन जाती है? व्यवहार कब गलती बनता है? और गलती कब अपराध होती है? किताब इन सवालों का कोई आसान फार्मूला नहीं देती। शायद इसलिए कि जिंदगी भी ऐसा कोई फार्मूला नहीं देती।

मानसिक उन्माद में लिया गया फैसला बाद में पागलपन लग सकता है। लेकिन, उस समय वही फैसला व्यक्ति को पूरी तरह सही लगता है। आत्मविश्वास लापरवाही बन जाता है। ऊर्जा जुनून में बदल जाती है। विचार इतनी तेजी से दौड़ते हैं कि उनके परिणाम पीछे छूट जाते हैं। और जब परिणाम आते हैं, तब तक ट्रेन काफी दूर निकल चुकी होती है।

नायर की सबसे बड़ी खूबियों में एक उनका हास्यबोध था। वह अपनी जिंदगी के सबसे खराब अध्यायों में भी विडंबना खोज लेते थे। शायद यही उनकी मानसिक ताकत थी। यह किताब इसलिए कोई मोटिवेशनल पोस्टर नहीं बनती। यह वह किताब नहीं है जिसमें लिखा हो; “मुश्किलों से मैंने सीखे जीवन के दस महान सबक।” न कोई बनावटी ज्ञान। न हर पन्ने पर चमकदार जीवन-दर्शन। बस एक आदमी है जो कहता है; मेरे साथ यह हुआ। और फिर पाठक खुद तय करता है कि इससे क्या समझना है। यही ईमानदारी किताब को असरदार बनाती है।

नायर ने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखना शुरू किया था। 2013 में उन्होंने पांडुलिपि डॉ आलोक गुप्ता को भेजी। भारत लौटने के बाद डॉ. गुप्ता ने उन्हें ग्लोट्रोनिक्स में काम करने का अवसर दिया। लगा कि शायद जिंदगी अब दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार है। लेकिन, बीमारी ने फिर दस्तक दी। नौकरी चली गई। पांडुलिपि भी जिंदगी की फाइलों में दब गई। और जिंदगी, जैसा कि अक्सर करती है, आगे बढ़ गई। फिर 2024 में नायर का निधन हो गया।

लेकिन, कहानी खत्म नहीं हुई थी। साल 2026 में डॉ गुप्ता को वह पुरानी पांडुलिपि फिर मिली। एक भूली हुई आवाज ने अचानक दरवाजा खटखटाया। नायर अब सफाई देने के लिए मौजूद नहीं थे। वह किसी घटना पर अपना पक्ष नहीं रख सकते थे। अपनी गलती को सही नहीं ठहरा सकते थे। किसी पुराने फैसले का संदर्भ नहीं समझा सकते थे। इसलिए किताब में उनकी आवाज जैसी थी, वैसी ही बची रही। कच्ची। बेबाक। मजेदार। कभी गुस्सैल। कभी कमजोर। और सबसे बढ़कर, इंसानी।

‘सिल्वर लाइनिंग्स इन द डार्क स्काई’ नायर को न निर्दोष साबित करने की कोशिश करती है, न उन्हें कटघरे में खड़ा करती है। वह सिर्फ हमसे थोड़ी समझ मांगती है। और थोड़ी इंसानियत।

मानसिक बीमारी को लेकर हमारा समाज अभी भी अजीब तरह से असहज है। शारीरिक बीमारी हो तो हम दवा, डॉक्टर और आराम की सलाह देते हैं। मानसिक बीमारी हो तो सलाह देने वालों की पूरी बारात निकल आती है। “हिम्मत रखो।” “अपने आपको कंट्रोल करो।” “ज्यादा मत सोचो।”

बाइपोलर डिसऑर्डर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसमें मूड, ऊर्जा और व्यवहार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है। समय पर उपचार, दवा, थेरेपी और परिवार का सहयोग व्यक्ति को स्थिर और सार्थक जीवन जीने में मदद कर सकते हैं। नायर की कहानी इसी समझ की जरूरत को सामने लाती है।

नायर की जिंदगी में उपलब्धियां थीं, लेकिन नुकसान भी कम नहीं थे। प्रतिभा हमेशा सफलता में नहीं बदल सकी। रिश्ते टूटे। मौके हाथ से निकले। बीमारी ने रास्ता रोका। गलत फैसलों ने कीमत वसूली। फिर भी कोशिश चलती रही। अमेरिका से भारत तक। कामयाबी से गिरावट तक। जेल से नई शुरुआत तक। और एक भूली हुई पांडुलिपि से प्रकाशित किताब तक। यही इस कहानी की असली ताकत है।

‘सिल्वर लाइनिंग्स इन द डार्क स्काई’ अंधेरे पर विजय की कहानी नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने लंबे समय तक अंधेरे में जिंदगी गुजारी। कई बार रास्ता खोया। कई बार खुद से हारा। कई बार दूसरों को दुख दिया। लेकिन, उसी अंधेरे में कभी-कभी हंसी की एक किरण भी खोज ली।

किताब पढ़ते हुए लगता है कि जिंदगी ने नायर को कोई आसान रास्ता नहीं दिया। लेकिन, शायद उन्होंने भी जिंदगी को आसानी से छोड़ने से इनकार कर दिया था। और, अंत में जिंदगी ने उन्हें एक आखिरी, बेहद विडंबनापूर्ण तोहफा दिया।

संतोष नायर शायद अपनी जिंदगी पूरी तरह वापस नहीं पा सके। लेकिन अंततः उन्हें अपनी कहानी वापस मिल गई। और कभी-कभी, शायद यही हमारी सबसे बड़ी ‘सिल्वर लाइनिंग’ होती है; जब जिंदगी की सारी रोशनियां बुझ जाएं, तब भी हमारी कहानी कहीं बची रह जाए।

पुस्तक : सिल्वर लाइनिंग्स इन द डार्क स्काई

पृष्ठ : 278

भाषा : अंग्रेज़ी

प्रकाशक : पिंक लोटस, वाराणसी

लेखक : संतोष नायर

संपादक : डॉ आलोक गुप्ता



Related Items

  1. 'नए भारत' का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर...!

  1. अंगदान से बदल रही है भारत की तस्वीर...

  1. अंतरिक्ष में उज्ज्वल है नए भारत का भविष्य