भारतीय जनता पार्टी विश्व का एक वृहद राजनैतिक दल है। इस दल की प्रगति का यदि हम आकलन करें तो इसके कार्यकर्ताओं का पार्टी के प्रति समर्पण, निष्ठा व त्याग का भाव देखते ही बनता है।
एक समय भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान व्यक्तित्व का प्रभाव रहा। बाद में, लाल कृष्ण आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी के कुशल नेतृत्व ने पार्टी को आगे बढ़ाया व फिर विगत 15 वर्षों में मोदी जैसे विराट व्यक्तित्व ने इसे और ज्यादा पल्लवित व पुष्पित किया है। फल यह है कि वर्ष 1984 में मात्र दो सीटों पर विजयी भाजपा, वर्ष 2019 तक 303 सीटों पर पहुंचने में सफल हो गई।
शुरू से ही भाजपा के अधिकांश कार्यकर्ता संस्कारवान्, निष्ठावान एवं संस्था के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले रहे हैं। इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन, वर्तमान में भाजपा कार्यकर्ताओं की ऊर्जा में कुछ शिथिलता दृष्टिगोचर हो रही है। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दो चरण व्यतीत हो चुके हैं। चुनावों से पूर्व जो सम्भावित दृश्य दिखाई दे रहा था, चुनावी प्रक्रिया के आगामी चरणों के साथ-साथ उसमें शनै:-शनै: कमी नजर आ रही है। इस स्थिति की सत्ता और विपक्ष में से किसी को भी आशंका नहीं थी। भाजपा का कट्टर समर्थक ठाकुर समुदाय का चुनावों के प्रथम चरण में ही पार्टी से अवश्यंभावी अलगाव होना अत्यधिक गम्भीर विषय है। इस स्थिति को भाजपा ने यदि अतिशीघ्र नियन्त्रित नहीं किया तो उसके लिए परिणाम भयावह हो सकते हैं।
हालांकि, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ठाकुरों की नाराजगी को दूर करने के लिए भाजपा ने प्रयास किए हैं, परन्तु प्रथम बार उसके प्रयास असफल ही लगे और ठाकुरों ने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश तथा आग्रह को लगभग अस्वीकार कर दिया। किसी भी प्रकार का विरोध अचानक उत्पन्न नहीं होता है, अपितु वह शनै:-शनै: सुलगता है। यदि उस विरोध को शुरू में ही नहीं रोका जाता है तो कालांतर में वह सुलगते हुए दावानल में परिवर्तित हो जाता है। ऐसी ही परिस्थिति भाजपा के लिए ठाकुर समुदाय की ओर से उत्पन्न हो गई प्रतीत होती है।
लोकसभा चुनाव प्रक्रिया के दौरान इस प्रकार की परिस्थिति का उत्पन्न होना भाजपा के लिए गम्भीर विषय है। इसकी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को कदापि आशा नहीं थी। इस गंभीर विषय पर यदि भाजपा के नेतृत्व ने शीघ्र मंथन नहीं किया तो ‘संस्कारवान’ दल अर्थात भाजपा को अत्यधिक क्षति सहन करनी पड़ सकती है।
भाजपा की इस समस्या पर चिंतन करने से पहले हमें कांग्रेस के पतन के कारणों का चिंतन भी करना चाहिए। जो कांग्रेस कभी लोकसभा की 400 सीटें आसानी से जीती, उसका इस तरह का पतन क्यों और कैसे हुआ? इसका कारण यह था कि उस समय कांग्रेस ने जनता की अपेक्षाओं को पूर्ण नहीं किया। साथ ही, पार्टी में सम्मिलित अन्य दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को समान महत्व न देना, पार्टी के नेताओं के द्वारा अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अवहेलना करना, उनको सहयोग न देना तथा उनको भ्रष्टाचार के दल-दल में लिप्त कर देना आदि प्रमुख कारण थे। इस सबसे त्रस्त होकर कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ताओं ने स्वयं को चुनावी प्रक्रिया से अपने को विरत कर लिया जो कि पार्टी के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।
एक समय कांग्रेस समर्पित कार्यकर्ताओं की पार्टी थी, परन्तु शीर्ष नेताओं के असहयोगात्मक व्यवहार ने पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को सदैव के लिए रुष्ट कर दिया। परिणामस्वरूप, कांग्रेस पार्टी का पतन आरम्भ हो गया। एक निष्ठावान कार्यकर्ता को पार्टी के हित से जुड़े सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने में सहयोग न मिलने पर वह शीर्ष नेताओं से मिलने की आस में भटकता रहता है। अन्ततः दुख के साथ पार्टी से विरत होना उसकी विवशता बन जाती है। इसके विपरीत, एक चापलूस और पार्टी से नया-नया जुड़ा कार्यकर्ता बहुत कम प्रयासों से ही निरन्तर कामयाब होता जाता है।
इस कार्यप्रणाली को समझते हुए, भाजपा नेतृत्व को अपनी पार्टी के स्थायी अस्तित्व को बनाए रखने के लिए गंभीर चिन्तन करने की आवश्यकता है, क्योंकि आज भाजपा में भी कांग्रेस से कई ‘भ्रष्ट’ नेताओं का समावेश हो चुका है। पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं एवं जनता के लिए यह कष्टप्रद होता है। भाजपा नेतृत्व को यह समझना होगा कि पार्टी के लिए कार्यकर्ता ईश्वर का स्वरूप होता है। उसका सम्मान न केवल पार्टी का स्थायित्व बल्कि मतदान प्रतिशत में भी वृद्धि करता है। इसके विपरीत, उसकी उदासीनता मतदान प्रतिशत को नीचे की ओर ले जाती है।

(लेखक आईआएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। यहां व्यक्त विचार उनके खुद के हैं।)






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