केरल, जिसे लंबे समय से कम्युनिस्टों का गढ़ माना जाता रहा है, जहां कभी कमल को मज़ाक में उगने वाली घास कहा जाता था, आज हर जगह चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। हाल ही में, तिरुवनंतपुरम में, अमित शाह की ज़ोरदार मौजूदगी, और उनका वक्तव्य, कोई साधारण भाषण नहीं था, बल्कि 2026 के लिए साफ़ चुनावी संदेश था। कल्पना कीजिए, लाल झंडों के बीच कमल खिलते हुए। यह सपना नहीं, एक नई राजनीतिक कोशिश है।
केरल की यह खासियत ही भाजपा को ललचाती है। लगभग 3.5 करोड़ की आबादी वाला यह राज्य शिक्षा में अग्रणी है, साक्षरता दर 94 फीसदी से ऊपर, जहां लड़कियां कॉलेज पहुंचने में उत्तर प्रदेश को चिढ़ाती हैं। उद्योगों में रबर, नारियल, मसाले, पर्यटन और आईटी हब कोच्चि का बोलबाला है, जो भारत की 'ह्यूमन डेवलपमेंट' मॉडल का चेहरा बनाते हैं। धार्मिक संरचना विविध, 55 फीसदी हिंदू, 27 फीसदी मुस्लिम, 18 फीसदी ईसाई, फिर भी 'गोड्स ओन कंट्री' का तमगा।
भारत की विकास गाथा में केरल का योगदान अनमोल: रेमिटेंस से चमकती अर्थव्यवस्था, लेकिन कम्युनिस्ट राज में बेरोजगारी और पलायन की कटु सच्चाई। अब भाजपा पूछ रही है, इतना 'विकसित' राज्य कब तक लाल जाल में फंसा रहेगा?
अमित शाह ने हाल ही में जीते भाजपा के स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों से बात करते हुए तीन नारे दिए, विकसित केरल, यानी विकास में मार्क्सवादी दखल नहीं; सुरक्षित केरल, यानी देशविरोधी ताक़तों से दूरी; और सांस्कृतिक सुरक्षा, यानी आस्था को कथित छद्म-धर्मनिरपेक्षता से बचाना। उन्होंने माकपा की एलडीएफ सरकार और कांग्रेस की यूडीएफ पर एक जैसी राजनीति करने का आरोप लगाया, कहा कि दोनों सत्ता बदलते रहते हैं, लेकिन आम जनता को कुछ नहीं मिलता।
सबरीमाला से जुड़े सोने की कथित चोरी का मुद्दा भी शाह ने फिर उठाया। उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की और पिनराई विजयन सरकार पर मामले को दबाने का आरोप लगाया। भाजपा की रणनीति साफ़ है, आस्था, भ्रष्टाचार और जनता का गुस्सा, तीनों को जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाना। उनका नारा गूंजा: “आज तिरुवनंतपुरम में भाजपा मेयर, कल केरल में भाजपा मुख्यमंत्री।”
तिरुवनंतपुरम में भाजपा का पहला मेयर, वीवी राजेश की जीत को लाल किले में दरार माना जा रहा है। इसके साथ 30 ग्राम पंचायतें, दो नगरपालिकाएँ और 80 जगहों पर दूसरे नंबर की स्थिति, भाजपा को उम्मीद दे रही है। हालांकि वोट प्रतिशत की बात करें तो 2014 में 11 फीसदी, 2019 में 16 फीसदी और 2024 में 20 फीसदी तक पहुंची भाजपा को कुछ इलाकों में गिरावट भी दिखी है। शाह इसे नज़रअंदाज़ करते हुए असम और यूपी जैसा उछाल दोहराने की बात करते हैं, लेकिन केरल खुद को अलग मानता है।
संगठन के स्तर पर भाजपा नए सिरे से तैयारी कर रही है। राजीव चंद्रशेखर की तकनीकी और प्रबंधन क्षमता, सुरेश गोपी की लोकप्रियता, जॉर्ज कुरियन का ईसाई समाज से जुड़ाव और अनिल एंटनी का कांग्रेस से आना, सब भाजपा के लिए संकेत हैं कि केरल में राजनीतिक ध्रुवीकरण बदल सकता है।
फिर भी मुकाबला आसान नहीं है। 2021 में 97 सीटों के साथ एलडीएफ अब भी मज़बूत है। यूडीएफ भी वीडी सतीशन के नेतृत्व में वापसी की तैयारी में है। भाजपा सबरीमाला, तटीय सुरक्षा, कट्टरपंथ जैसे मुद्दों पर भरोसा कर रही है और अल्पसंख्यकों तक पहुंच बनाने की कोशिश में है। ईसाई समुदाय में भी हलचल दिखाई दे रही है। कुछ क्षेत्रों में ईसाई समुदाय द्वारा खुलकर भाजपा को समर्थन मिल रहा है। केरल में जाति और वर्ग की बातें अक्सर दबे स्वर में होती हैं, लेकिन राजनीति में उनका असर साफ़ है। विचारधारा से ज़्यादा सत्ता की लड़ाई अहम हो जाती है।
एक दिलचस्प नाम चर्चा में है, शशि थरूर। कांग्रेस के बड़े नेता, अंतर्राष्ट्रीय छवि वाले थरूर को लेकर कयास हैं कि भाजपा उन्हें केरल में चेहरे के रूप में देख सकती है। वह इन अटकलों से इनकार करते हैं, लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।
अप्रैल नज़दीक है। केरल में अभी केसरिया तूफान नहीं आया है, लेकिन दरवाज़ा थोड़ा खुल चुका है। अब सवाल यही है, क्या भाजपा सच में किला फतह करेगी, या यह कोशिश सिर्फ़ एक मरीचिका साबित होगी? फैसला केरल की जनता करेगी, दिल से या ज़रूरत से।






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