खतरे में है बृज मंडल का पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत


श्रीकृष्ण और राधा की कथाओं से जुड़े अपने पवित्र परिदृश्यों के लिए पूजनीय समूचा चौरासी कोस का बृज मंडल क्षेत्र, अनियोजित निर्माण के उन्माद से तेजी से पर्यावरणीय क्षरण देख रहा है।

ऐतिहासिक रूप से अपनी देहाती अर्थव्यवस्था, पवित्र वनों, पवित्र पहाड़ियों, नदियों और तालाबों के लिए प्रसिद्ध यह भूमि अब एक ऐसे संकट का सामना कर रही है जो इसके पारिस्थितिक संतुलन और आध्यात्मिक सार को खतरे में डाल चुका है।

गोवर्धन और वृंदावन में पारंपरिक परिक्रमा मार्गों के कंक्रीटीकरण ने पर्यावरणविदों की चिंता की लकीरें गहरी कर दीं हैं। आधुनिक सड़कें, ऊंचे-ऊंचे आश्रमों वाले विशाल मंदिर और व्यावसायिक परिसर उन प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्थलों की जगह ले रहे हैं जो कभी इस पवित्र भूमि को परिभाषित करते थे।

कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह अनियोजित शहरीकरण बृज मंडल के देहाती चरित्र और प्राचीन गौरव को खत्म कर रहा है, जिसे लाखों भक्त और तीर्थयात्री हर साल संजोते हैं। पौराणिक रूप से, बृज की विशेषता हरे-भरे सदाबहार जंगल, तालाब और नदियां थीं, जो इसके गहरे पारिस्थितिक महत्व को दर्शाती हैं। श्री कृष्ण की पूजा और भक्ति के केंद्र में स्थित ये प्राकृतिक विशेषताएं अब आधुनिक ‘उन्नयन’ के पक्ष में बुलडोजर और जेसीबी के निशाने पर हैं जो बृज की विरासत के साथ तालमेल बिठाने में विफल हैं।

अब समय आ गया है कि योगी सरकार द्वारा गठित बृज तीर्थ विकास परिषद के कारनामों, बजट और योजनाओं का सामाजिक ऑडिट हो ताकि जनता जान सके कि इस सफेद हाथी ने बृज संस्कृति को कैसे समृद्ध किया है। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसके गठन के बाद आध्यात्मिक विरासत के केंद्र मथुरा और वृंदावन, खराब नियोजित शहरी विस्तार से पीड़ित हुए हैं।

वृंदावन तो अब टूरिस्ट स्पॉट में बदल रहा है। पुराने भवनों को ध्वस्त करके होटल और मार्केट कॉम्प्लेक्स, ऊंची इमारतें वृंदावन के क्षितिज पर हावी हैं, जिससे हरियाली के लिए बहुत कम जगह बची है। बृज के पारिस्थितिकी तंत्र और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण पवित्र कुंड सूख रहे हैं या उन पर अतिक्रमण किया जा रहा है। यातायात की भीड़, अनियंत्रित सीवेज और बड़े पैमाने पर अतिक्रमण ने इस क्षेत्र को अव्यवस्थित कंक्रीट के फैलाव में बदल दिया है।

स्थानीय हरित कार्यकर्ताओं को चिंता है कि बृज संस्कृति का सार लुप्त हो रहा है। इस अथक शहरीकरण के बीच पवित्र शहर अपनी आध्यात्मिक और पारिस्थितिक पहचान खो रहे हैं। पुरातन गौरव के हिमायती मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और तीर्थ विकास परिषद को दोषी ठहराते हैं। विकास परियोजनाएं अक्सर वास्तुकला और पर्यावरण अनुकूलता को नजरअंदाज करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप शहरी विकृतियां पैदा होती हैं जो बृज के पवित्र और देहाती आकर्षण के साथ टकराव पैदा करती हैं।

एक विद्वान इस क्षेत्र को ‘तीन अलग-अलग युगों में रहने वाला’ बताते हैं, जिसमें प्राचीन अवशेष, मध्ययुगीन संरचनाओं और आधुनिक ऊंची इमारतें शामिल हैं। उदाहरण के लिए, श्री कृष्ण का प्रस्तावित गगनचुंबी मंदिर क्षेत्र की गलत प्राथमिकताओं का प्रतीक बताया गया है। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से पहले से ही सीमित जल और बिजली संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।

परिक्रमा मार्गों के 100 मीटर के भीतर कंक्रीट निर्माण पर प्रतिबंध लगाने वाले राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देश के बावजूद, प्रवर्तन लचर बना हुआ है। हरित कार्यकर्ता कहते हैं कि लक्जरी विकास परियोजनाएं, जैसे कि पांच सितारा होटलों को टक्कर देने वाले बंगले, बृज के आध्यात्मिक सार को अपवित्र करते हुए बेरोकटोक जारी हैं।

हेमा मालिनी जैसी प्रमुख राजनेता बृज की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत को संरक्षित करने के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्रदान करने में विफल रही हैं। संरक्षणवादी सतत विकास का मार्गदर्शन करने के लिए एक स्थानीय कला पैनल की आवश्यकता पर बल देते हैं। बृज मंडल के पारिस्थितिक संतुलन और सांस्कृतिक प्रामाणिकता को बहाल करने के लिए तत्काल, समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। अपने पवित्र हरित स्थलों और जलमार्गों को संरक्षित करने से लेकर अनियंत्रित शहरीकरण को रोकने तक, इस क्षेत्र को एक व्यापक कार्य योजना की आवश्यकता है।

कचरा प्रबंधन, यातायात विनियमन और विरासत वास्तुकला के संरक्षण जैसे उपाय बृज की विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं। बृज मंडल के तीर्थ स्थल, जो काव्य साहित्य में अमर हैं और धार्मिक दृष्टि से  पूजनीय हैं, वे न केवल अतीत के अवशेष हैं बल्कि इसकी जीवंत संस्कृति के महत्वपूर्ण पोषक तत्व हैं। बृज के पुरातन गौरव और स्वरूप को संरक्षित नहीं किया गया तो बाजारवाद इस पवित्र भूमि की आत्मा की हत्या का गुनाहगार माना जाएगा।



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