क्षेत्रीय

उत्तर-पूर्वी भारत की ऊंची पहाड़ियों और घाटियों में एक शांत क्रांति हो रही है। यहां बदलाव बड़े-बड़े ऐलान के साथ नहीं आता बल्कि, यह अलग-अलग कूड़ेदानों की हल्की खड़खड़ाहट, गांव द्वारा चलाए जा रहे रीसाइक्लिंग यूनिट की धीमी आवाज़, और उन नागरिकों के पक्के कदमों से आता है जो अपनी ज़मीन को कचरे में डूबने नहीं देना चाहते...

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क्या उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था योगी आदित्यनाथ के शासन में वाकई में सुधरी है, या शांति सिर्फ बंदूक की नोक पर थोप दी गई है...

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केरल, जिसे लंबे समय से कम्युनिस्टों का गढ़ माना जाता रहा है, जहां कभी कमल को मज़ाक में उगने वाली घास कहा जाता था, आज हर जगह चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। हाल ही में, तिरुवनंतपुरम में, अमित शाह की ज़ोरदार मौजूदगी, और उनका वक्तव्य, कोई साधारण भाषण नहीं था, बल्कि 2026 के लिए साफ़ चुनावी संदेश था। कल्पना कीजिए, लाल झंडों के बीच कमल खिलते हुए। यह सपना नहीं, एक नई राजनीतिक कोशिश है।

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शाम की सैर, ठंडी हवा, एक मासूम-सा मज़ाक, और अचानक एक कड़वी सच्चाई सामने आ गई। पार्क की पगडंडी पर टहलते हुए मेरी मुलाक़ात हमारे बेहद तहज़ीबदार बंगाली बैंक मैनेजर, चटर्जी बाबू से हो गई। हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछ लिया, “तो चटर्जी बाबू, 1 अप्रैल को रिटायरमेंट के बाद कोलकाता की ट्रेन पकड़ रहे हैं?”

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अमित शाह की कथित ‘मास्टरस्ट्रोक’ राजनीति ने बिहार में झंडा गाड़ दिया, अब सवाल यह है कि क्या वही हिंदुत्व की आंधी तमिलनाडु के द्रविड़ दुर्ग की मोटी दीवारों में दरार डाल पाएगी? या यह किला, हर बार की तरह, बाहरी हमलों को ठंडे आत्मविश्वास से झेल लेगा...

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साल 2026 की शुरुआत में कर्नाटक एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर राज्य की राजनीति कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संघर्ष, गुटबाज़ी और सत्ता-संतुलन की रस्साकशी में उलझी है, तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था पूरे वेग से आगे बढ़ रही है। सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच ठंडी लेकिन लगातार बनी रहने वाली तनातनी ने राजनीतिक माहौल को अस्थिर बना रखा है, फिर भी विकास की गाड़ी रुकी नहीं है...

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कर्नाटक इन दिनों किसी रियासत की तरह चल रहा है! नाश्ते की मेज़ पर मुख्यमंत्री और उनके डिप्टी इडली-वड़ा नहीं, बल्कि तख़्त की लड़ाई लड़ रहे हैं, धीमी गति की चाकू-छुरी वाली जंग की तरह, और दिल्ली का तथाकथित हाईकमान गलियारे में सहमा खड़ा है, महाभारत के धृतराष्ट्र जैसा हिचकिचाता हुआ...

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सियासत का पारा चढ़ चुका है, हवा में नारे हैं, गलियों में जोश है और दिलों में उबाल! पटना से पूर्णिया तक, हर नुक्कड़ पर एक ही सवाल गूंज रहा है, “अबकी बार कौन?” नवंबर की ठंडी हवाओं के बीच बिहार फिर से एक गर्म रणभूमि में बदल चुका है।

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जब मुल्क की सियासत में एक तरफ़ भगवा गंगा बह रही हो और दूसरी ओर कावेरी में लुभावनी 'गारंटियों' की बारिश हो रही हो, तब विकास की असली तस्वीर आंकड़ों की खामोश ज़ुबान में छुप जाती है।

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बिहार में मानसून की बारिश के बाद विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर होंगी लेकिन इस वक्त सियासी हवा का रुख तेजी से बदल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद बिहार में रैलियां करके अपनी मुहिम की शुरुआत कर दी है...

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