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बीते कई राजनीतिक और सामाजिक प्रकरणों में रिपोर्टिंग से ऐसा लगने लगा है कि मीडिया अपनी मारक क्षमता कहीं खो बैठा है। मीडिया के सुर, लय और ताल के खो जाने से खिन्न ब्रज खंडेलवाल बता रहे हैं इसकी वजह...। इस विमर्श में भाग लेने और अपनी राय व्यक्त करने के लिए अभी सब्सक्राइब करें, महज एक रुपये में...

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कोरोना काल में, हालांकि, घरेलू निवेश करने की बात थोड़ी अटपटी तो लगती है लेकिन सतत छोटा निवेश किसी भी घर की अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू है। ऐसे समय में जब आमदनी कम हुई है, नौकरियां छूट रही हैं, फिर भी, छोटे-छोटे निवेशों के जरिए इस प्रक्रिया को कैसे जारी रखा जा सकता है? इसी तरह के कई सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वित्त नियोजक अभिनव गुप्ता। आलेख को पढ़ने और साक्षात्कार के दौरान पूछे गए सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए अभी सब्सक्राइब करें महज एक रुपये में...

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किसानों के संघर्ष की मुख्य वजह बना न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी आखिर है क्या? बहुत ही आसान भाषा में बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रिय रंजन झा। विषय से संबंधित विमर्श में भाग लेने के लिए महज एक रुपये में अभी सब्सक्राइब करें... 

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किसान सड़कों पर उतरकर नए कृषि कानून का विरोध कर रहे हैं। लेकिन, ये पंजाब के किसान हैं। यूपी, बिहार, महाराष्ट्र या कर्नाटक के किसान इस तरह का विरोध नहीं कर रहे हैं। क्यों नहीं कर रहे हैं, यह सवाल है। क्या पंजाब के किसान नए कृषि कानूनों को समझ नहीं पा रहे हैं? इसके विपरीत, केंद्र सरकार विरोध कर रहे इन किसानों को क्यों नहीं समझा पा रही है? क्या किसानों की आड़ में नेतागिरी हो रही है? असली समस्या क्या है? इसका हल क्या है? ऐसे ही कई सवालों पर विचार-विमर्श के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन झा। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में भाग लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें, मात्र एक रुपये में...

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यूपी, मध्य प्रदेश और अब हरियाणा में भी सरकारों ने लव जिहाद पर कानून बनाए जाने के संकेत दे दिए हैं। कानून बन भी जाएंगे, लेकिन क्या वाकई लव जिहाद जैसा कुछ है भी या यह बीजेपी के खुराफाती दिमाग की महज उपज मात्र है? हाल ही में कुछ घटनाएं ऐसी भी हुईं जिनमें हिंदू वधू और मुस्लिम वरों के रिश्ते टूटे हैं लेकिन सामाजिक जमीन पर ये घटनाएं लव जिहाद के दायरे में आती भी हैं या नहीं...? साथ ही, क्या अपनी पहचान छुपाकर रिश्ते बनाने के मामलों के पीछे लव जिहाद ही है? ऐसे ही कई सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार केशव चतुर्वेदी। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में भाग लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें, मात्र एक रुपये में... 

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बिहार चुनावों के परिणाम हमारे सामने आ चुके हैं... और, जैसे कि पिछले कई बार से एक्जिट पोल के नतीजे लगातार गलत आ रहे हैं, इस बार भी गलत ही साबित हुए। तो, क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि एक्जिट पोल की इस ‘बेवकूफाना’ अवधारणा को उठाकर डिब्बे में बंद कर कहीं दूर फेंक दिया जाए…? एक्जिट पोल की प्रासंगिकता और इससे जुड़े कई दूसरे सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं मीडिया आलोचक और वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल। आप भी इस साक्षात्कार में हिस्सा ले सकते हैं। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में पूछे गए सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए महज एक रुपये में अभी सब्सक्राइब करें...

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