भूटान के पीएम लाते शेरिंग का हालिया बयान भारत के लिए एक चिंता बनकर आया है। हाल ही में उन्होंने कहा कि डोकलाम की स्थिति को सुलझाने के लिए चीन भी बराबर का भागीदार है। उनके इस बयान का अर्थ यह है कि उन्होंने इस मामले में अब चीन को भी एक पक्ष मान लिया है और यह बात भारत और भूटान, दोनों के लिए ही बिल्कुल भी सही नहीं है।
भारत कभी नहीं चाहेगा कि डोकलाम मामले में चीन की कोई भी भागीदारी हो। अगर चीन किसी भी तरह डोकलाम को हड़प लेता है तो इससे सिलीगुड़ी कॉरिडोर को खतरा पैदा हो जाएगा। यह वह ‘चिकन नेक’ क्षेत्र है, जहां से भारत पूर्वोत्तर राज्यों से सीधे-सीधे जुड़ता है। यदि चीन माउंट गिप्मोची तक पहुंचता है तो वहां से फिर वह ‘चिकन नेक’ पर सीधे निगाह रख सकता है। इस मकसद को लेकर साल 2017 से ही चीन लगातार डोकलाम पर दबाव बनाए हुए है।
हाल ही में ऐसी कई रिपोर्टें आई हैं जिनके अनुसार चीन भूटान की सीमा पर डोकलाम पठार से जुड़े कई स्थानों पर अपने तथाकथित गांव बसा चुका है। आमूचू नदी के किनारे कई आधारभूत निर्माणों का दावा किया गया है। साल 2017 में जहां भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने आई थीं, वहां से यह जगह महज 10 किलोमीटर की दूरी पर है।
इधर, हमारे पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा के लिए भारत और भूटान के आपसी सहयोग की एक बड़ी आवश्यकता है। भूटान ने पहले भी पूर्व के हिस्से में भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने में अहम भूमिका निभाई है। आगे भी यही स्थिति बनाए रखने की जरूरत है।
अब सवाल यह है कि क्या भूटानी प्रधानमंत्री के ताजा बयान के पीछे भारत की ओर से कूटनीतिक स्तर पर कोई चूक हुई है? या यह एक ‘नौसिखिए’ प्रधानमंत्री का गलती से दिया गया एक बयान भर है। आगामी 3 से 5 अप्रैल के बीच भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक भारत की एक पूर्व निर्धारित यात्रा कर रहे हैं तो लाजिमी है कि आपसी बातचीत में यह मुद्दा जरूर उठेगा। एक अनावश्यक बयान की वजह से उठी धुंध को साफ करना अब बहुत जरूरी हो गया है। यहां भारत को अब भूटान के साथ रिश्तों के मामले में सही सूझ-बूझ दिखाने की जरूरत है। चीन की विस्तारवादी नीति से भूटान भी अपरिचित नहीं है। पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के साथ चीन की नीतियों को भी भूटान भली भांति जानता है।
भूटान के हुक्मरानों को इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखना होगा कि ‘पड़ोस को प्राथमिकता’ की 'मोदी नीति' से भूटान का भी हित है। पूर्व में हुए एक समझौते के तहत भारत की सेनाएं ही भूटानी सीमाओं की रक्षा करती हैं। भूटान के प्रशासनिक अधिकारियों का प्रशिक्षण भी एक अन्य करार के तहत भारत में ही होता है। इसके अलावा, भारत के साथ हुए रक्षा समझौते के चलते भूटान किसी भी दूसरे देश के साथ द्विपक्षीय वार्ता नहीं कर सकता है। यदि भूटानी प्रधानमंत्री का यह बयान जान-बूझकर दिया गया है तो यह उस समझौते का सीधा-सीधा उल्लंघन है। इस समझौते के बदले में ही भारत उसे सैन्य सुरक्षा प्रदान करता है।
नागरिक सुविधाओं के मामले में भी वर्तमान स्थिति यह है कि भूटान में भारत के बिना कोई सार्वजनिक गतिविधि चल ही नहीं सकती है। चाहे वह उनके लिए बिजली हो, सुरक्षा हो या रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजें हों। अब यदि वास्तव में चीन ने भूटान को कोई ऐसी विशेष घुट्टी पिलाई है, जिससे वह ‘भटकने’ लगा है तो भारत के विकल्प के रूप में चीन को दी जाने वाली यह प्राथमिकता भूटान को वाकई भारी पड़ेगी। दो हाथियों की लड़ाई में जैसे पाकिस्तान का विनाश हो रहा है, ठीक वैसी ही गति भूटान को भी प्राप्त होने की आशंका है।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं)






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