फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म होने को है!


दिल्ली में फिर वही मौसम लौट आया है। धरने-प्रदर्शन देखते ही देखते समेटे जा रहे हैं। कल की इंक़लाबी हुंकार आज महज एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बन जाती है। आज का गुस्सा कल इस्तीफे पर खत्म हो जाता है।

ताज़ा ब्लॉकबस्टर भी वक्त पर आ गई। एक इस्तीफा, कुछ नाटकीय ऐलान, सोशल मीडिया पर शानदार तमाशा, और देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी ने जीत का एलान कर दिया। बैनर समेटे गए, लाउडस्पीकर बंद हुए और सब घर लौट गए, जैसे इतिहास की दिशा ही बदल गई हो।

और हां... राष्ट्र के नाम संदेश भी आया। एक बार नहीं। दो बार नहीं। तीन-तीन बार। जब नेताजी इंस्टाग्राम पर देश से बातें करने लगें, तो समझ लीजिए कि भारतीय राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जिसकी कल्पना संविधान बनाने वालों ने भी नहीं की होगी। अर्थशास्त्री संदेश ढूंढते रहे। मनोवैज्ञानिक उसके मायने तलाशते रहे।

इस बीच, अगली फिल्म का ऐलान कर दिया गया। ‘कॉकरोच फिर लौटेंगे!’ वैज्ञानिक आज भी कॉकरोच पार्टी पर हैरान हैं। परमाणु बम शहर को मिटा सकता है। बाढ़ पुल बहा सकती है। चुनाव सरकारें गिरा सकते हैं। लेकिन, तिलचट्टे हर बार मुस्कुराते हुए वापस आ जाते हैं। हाथ में एक तरफ इस्तीफे की मांग, दूसरी तरफ भविष्य के गठबंधन का गुलदस्ता। इतनी जबर्दस्त अनुकूलन क्षमता तो शायद डार्विन ने भी नहीं सोची होगी।

सत्ता पक्ष उस स्कूल के हेडमास्टर जैसा है, जिसे लगता है कि सुबह का सूरज भी उसकी इजाज़त लेकर निकलता है। हर उपलब्धि दूरदर्शी नेतृत्व का कमाल है। हर आलोचना साज़िश है। और, जो ज़्यादा सवाल पूछे, उसे विकास-विरोधी या राष्ट्र-विरोधी घोषित किया जा सकता है। फिर बारी आती है विपक्ष की। चलते नहीं। दौड़ते भी नहीं। बस... कॉकरोचों की तरह सर्र से निकल लेते हैं।

सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है, जिंदा रहना। इस हफ्ते दहाड़ेंगे। अगले हफ्ते बातचीत करेंगे। उसके अगले हफ्ते लोकतंत्र बचाने का श्रेय भी खुद ले लेंगे। नई पीढ़ी ने ,सीजेपी का नया मतलब निकाल लिया है। अब इसका अर्थ कॉकरोच जनता पार्टी नहीं। बल्कि सर्टिफाइड जंपर्स पार्टी है। इसका चुनाव चिह्न कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल या हाथी नहीं होना चाहिए। एक घूमता हुआ दरवाज़ा होना चाहिए।

सदस्य बनने के नियम भी आसान हैं। किसी विचारधारा की ज़रूरत नहीं। सिद्धांत हों तो अच्छा, न हों तो और भी अच्छा। बस एक छोटा बैग, तीन माइक, भरपूर नैतिक गुस्सा और ऐसी रीढ़ चाहिए जो बिना दर्द के 360 डिग्री घूम जाए।

सुना है पार्टी की ट्रेनिंग अकादमी में खास कोर्स भी चलते हैं। "अगली सूचना तक धरना कैसे दें" "यू-टर्न लेने की उन्नत कला" और सबसे लोकप्रिय विषय है कि "स्कोर चाहे कुछ भी हो, जीत का एलान कैसे करें।" दीक्षांत समारोह में सबकी फोटो भी खिंचती है। मुश्किल सिर्फ इतनी होती है कि फोटो छपने तक आधे लोग दूसरी पार्टी में पहुंच चुके होते हैं।

आजकल प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी किसी रियलिटी शो से कम नहीं हैं। पहला एपिसोड, लोकतंत्र खतरे में है। दूसरा, लोकतंत्र बच गया। तीसरा, सरकार हमारी वजह से झुकी। चौथा, धरना समाप्त। और, पांचवां, जल्द मिलेंगे, नया आंदोलन लेकर। ओटीटी प्लेटफॉर्म के लेखक भी अब शिकायत करने लगे हैं कि राजनीति की पटकथा उनकी कल्पना से भी आगे निकल गई है।

राजनीतिक प्रवक्ता भाषा के सबसे बड़े जादूगर हैं। पीछे हटना रणनीतिक जीत बन जाता है। इस्तीफा नैतिक भूकंप कहलाता है। चुप्पी दूरदर्शिता बन जाती है। और, उलझन को रणनीति बताया जाता है।

उधर, असली कॉकरोचों ने भी नाराज़गी जता दी है। राष्ट्रीय कॉकरोच प्रतिष्ठा महासंघ ने बयान जारी किया। "हम इस तुलना का सख्त एतराज़ करते हैं। हम सिर्फ रसोई में घुसते हैं। नेता टीवी स्टूडियो, व्हाट्सऐप ग्रुप, संस्थाओं और कभी-कभी एक-दूसरे की पार्टियों में भी घुस जाते हैं।

शुक्र है, सोशल मीडिया अब देश की सबसे बड़ी व्यंग्य पत्रिका बन चुका है। एक सूटकेस घसीटते कॉकरोच का मीम चार घंटे की टीवी बहस से ज़्यादा सच्चाई दिखा देता है। एक इमोजी पूरे हफ्ते की राजनीति समझा देता है।

लोकतंत्र कोई टैलेंट शो नहीं है, जहां हर ब्रेक के बाद कलाकार नई पोशाक पहनकर लौट आएं। इसे ऐसे हुक्मरानों की ज़रूरत है जो जवाब दें, ऐसे विपक्ष की जो अपने पांव पर डटा रहे, ऐसे पत्रकारों की जो मुश्किल सवाल पूछें और ऐसे नागरिकों की जो हर तालियों के इशारे पर ताली न बजाएं। वरना, हर चुनाव सिर्फ कीटनाशक छिड़कने का नया कार्यक्रम बनकर रह जाएगा। स्प्रे बड़े शोर-शराबे से छिड़का जाएगा। और, कॉकरोच हर बार मुस्कुराते हुए लौट आएंगे।

तो आख़िर नालियां किसने खोलीं? हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है। रोशनी मंद पड़ती है। कैमरे बंद हो जाते हैं। दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं कोई मुस्कुराता है। मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है। और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है, "फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म होने को है!"



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