भारत का नारियल क्षेत्र ग्रामीण आजीविका, कृषि विकास और सांस्कृतिक परंपराओं को संबल प्रदान करता है। लगभग 10 मिलियन किसानों सहित करीब 30 मिलियन लोग इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।
वैश्विक नारियल उत्पादन में भारत पहले स्थान पर है, जहां केरलम क्षेत्रफल में, तमिलनाडु उत्पादन में और आंध्र प्रदेश उत्पादकता में सबसे आगे है। भारत की निर्यात सूची पारंपरिक उत्पादों से आगे बढ़कर वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल का दूध और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे मूल्य-वर्धित उत्पादों तक विस्तारित हुई है।
‘कल्पवृक्ष’ यानी जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने वाले वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित, नारियल भारत की विरासत, संस्कृति और कृषि अर्थव्यवस्था में गहराई से रचा-बसा है। विभिन्न सभ्यताओं में इसके बहुमुखी उपयोग के कारण इसे हज़ारों उपयोगों वाला वृक्ष माना गया है। यह भोजन, पेय, औषधि, रेशा, इमारती लकड़ी, ईंधन और कई प्रकार के कच्चे माल प्रदान करता है। ये संसाधन परिवारों, पारंपरिक प्रथाओं और मूल्य-वर्धित उद्योगों के बढ़ते तंत्र को सहारा देते हैं।
भारत में नारियल की खेती का लगभग तीन सहस्राब्दियों का सुव्यवस्थित इतिहास रहा है और यह ग्रामीण रोज़गार एवं आर्थिक संबल का एक महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। लगभग 10 मिलियन किसानों सहित करीब 30 मिलियन लोग नारियल क्षेत्र पर निर्भर हैं, जिससे यह ग्रामीण आजीविका के लिए अनिवार्य बन जाता है।
मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों द्वारा उगाए जाने के कारण नारियल समावेशी विकास और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को सशक्त करने में अहम भूमिका निभाता है। इसके बढ़ते महत्व का एक उदाहरण छत्तीसगढ़ में देखा जा सकता है, जहां किसानों ने नारियल की खेती को एक व्यावहारिक आजीविका विकल्प के रूप में अपनाना शुरू किया है।
वैश्विक नारियल अर्थव्यवस्था में भारत का प्रमुख स्थान है। भारत नारियल उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर और कृषि क्षेत्रफल में तीसरे स्थान पर है, जो वैश्विक कुल का क्रमशः 31.24 प्रतिशत और 17.90 प्रतिशत है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान भारत ने 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 20,301.22 मिलियन नारियल का उत्पादन किया। इसकी औसत उत्पादकता 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही।
देश के भीतर, केरलम में नारियल की खेती का सबसे बड़ा क्षेत्र है, जो लगभग 7.54 लाख हेक्टेयर में फैला है और जहां लगभग 5,149.87 मिलियन नारियल का उत्पादन होता है। तमिलनाडु नारियल उत्पादन में सबसे आगे है, जबकि आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक उत्पादकता दर्ज की गई है, जिसके बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का स्थान है।
प्राथमिक उत्पादन से आगे बढ़कर, नारियल क्षेत्र भारत के निर्यात लक्ष्यों को सहारा देते हुए कृषि निर्यात में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में उभरा है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक दो ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर और 2047 तक 21 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात हासिल करना है।
इन निर्यात लक्ष्यों के अनुरूप, हाल के वर्षों में भारत के नारियल निर्यात में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2025-26 में नारियल उत्पादों का निर्यात 7,038.35 करोड़ रुपये (794.70 मिलियन अमेरिकी डॉलर) पहुंच गया। यह 4,349.03 करोड़ रुपये की तुलना में 62 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है। यह भारत से नारियल उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग को रेखांकित करता है। यह वृद्धि 2001-02 के बाद से हुई महत्वपूर्ण प्रगति को भी दर्शाती है, जब निर्यात केवल 25.3 करोड़ रुपये था। उस समय निर्यात मुख्य रूप से नारियल के खोल का कोयला शेल चारकोल, नारियल तेल, कच्चा नारियल और सूखा नारियल,पारंपरिक उत्पादों तक ही सीमित था।
समय के साथ, भारत की नारियल निर्यात सूची पारंपरिक जिंसों से विकसित होकर मूल्य वर्धित उत्पादों की एक विविध शृंखला में बदल गई है। क्षेत्र अब वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल के दूध और नारियल पानी की वैश्विक मांग को पूरा करता है। यह अन्य उपयोग-आधारित उत्पादों की भी आपूर्ति करता है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत हुई है। इसका बाज़ार मध्य पूर्व जो कभी इसका प्राथमिक गंतव्य था से आगे बढ़कर अब यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बाजारों तक पहुंच चुका है।
पिछले पांच वर्षों में अमेरिका, यूएई, श्रीलंका, जर्मनी, रूस, तुर्किये, बेल्जियम, यूके और नीदरलैंड प्रमुख व्यापारिक साझेदार बनकर उभरे हैं। प्रमुख निर्यात उत्पादों में सक्रिय कार्बन, नारियल तेल, ताजा जमा या कद्दूकस किया हुआ नारियल, कोपरा और सूखा नारियल शामिल हैं। इनमें सक्रिय कार्बन का निर्यात मात्रा में लगातार शीर्ष पर रहा है।
पीढ़ियों से ‘जीवन वृक्ष’ के रूप में पूजनीय नारियल भारत के सांस्कृतिक और ग्रामीण परिदृश्य में गहराई से रचा-बसा है। समय के साथ यह क्षेत्र पारंपरिक खेती से बहुत आगे निकल चुका है। मजबूत नीतिगत समर्थन, किसान समूहन और कौशल विकास पहलों ने इसकी मूल्य श्रृंखला को सुदृढ़ किया है।
रोपण सामग्री में सुधार, रकबे के विस्तार और पुराने बागानों के जीर्णोद्धार के प्रयास किसानों के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं। साथ ही, मूल्य-वर्धित उत्पादों की बढ़ती मांग वैश्विक बाजारों में भारत की उपस्थिति का विस्तार कर रही है। निरंतर संस्थागत समर्थन के साथ, भारत का नारियल क्षेत्र एक पारंपरिक सांस्कृतिक प्रतीक से उभरकर विश्व स्तर पर एक प्रमुख क्षेत्र बन गया है।

समीक्षा भारती न्यूज सर्विस





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