साल 1987 में रिलीज और राज एन सिप्पी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ का गीत ‘दिल में हो तुम...’ को बप्पी लाहिरी के संगीत, फारूक कैसर के बोल और अलग-अलग गायकों की आवाजों ने एक खास पहचान दी। इस गीत के पुरुष संस्करण को बप्पी लाहिरी ने अपनी आवाज दी, जबकि महिला संस्करण को एस जानकी ने गाया। इसे विनोद खन्ना और अनीता राज पर फिल्माया गया था।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसी साल, इसी धुन से सजी बंगाली फिल्म ‘अमर संगी’ का गीत ‘चिरोदिनी तुमी जे अमार’ भी लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा था। सुजीत गुहा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में प्रसेनजीत चटर्जी और विजेयता पंडित मुख्य भूमिकाओं में थे। गीत के बोल पुलक बंद्योपाध्याय ने लिखे थे। किशोर कुमार की आवाज में इसका पुरुष संस्करण और आशा भोसले की आवाज में इसका महिला संस्करण सामने आया। आज ये दोनों संस्करण बंगाली संगीतप्रेमियों के बीच अमर प्रेमगीतों की श्रेणी में गिने जाते हैं।
बप्पी लाहिरी को आम तौर पर तेज लय वाले डिस्को संगीत और लोकप्रिय धुनों के लिए याद किया जाता है, लेकिन उनकी संगीत-यात्रा का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसमें कोमल धुनें, रोमांटिक भावनाएं और गायकी की सहजता प्रमुखता से दिखाई देती हैं। ‘दिल में हो तुम...’ इसी पक्ष का अच्छा उदाहरण है। यहां संगीत का उद्देश्य शोर या चकाचौंध पैदा करना नहीं, बल्कि प्रेम की ऐसी अनुभूति रचना है, जो सुनने वाले को सीधे अपने अनुभवों से जोड़ सके।
गीत की शुरुआत में ही धुन का रोमांटिक मिजाज स्थापित हो जाता है। स्वर और वाद्य-संगीत के बीच संतुलन इसे सहजता से आगे बढ़ाता है। इसकी धुन में एक ऐसी सरलता है, जो पहली बार सुनते ही याद रह जाती है। बप्पी लाहिरी की आवाज गीत को एक आत्मीयता देती है। एस जानकी की आवाज में यही धुन अधिक कोमल और भावुक अनुभव देती है।
हिंदी फिल्मों में प्रेमगीत अक्सर कहानी की गति को कुछ समय के लिए धीमा करके दर्शकों को पात्रों से जोड़ने के करीब ले आते हैं। ‘दिल में हो तुम...’ का प्रभाव भी इसी फिल्मी परंपरा के भीतर समझा जा सकता है। कलाकारों के चेहरे के भाव, एक-दूसरे की ओर देखने का अंदाज और संगीत की लय के साथ दृश्यों का तालमेल गीत के रोमांटिक वातावरण को आकार देता है। यहां अभिनय का महत्व केवल नृत्य या शारीरिक गतिविधियों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे हावभाव में है, जिनसे आकर्षण, अपनापन और भावनात्मक निकटता व्यक्त होती है।
गीत के दोनों संस्करणों, बल्कि कहिए कि चारों संस्करणों को, एक ही धुन पर आधारित रखना भी अपने आप में एक प्रभावशाली संगीत-निर्णय था। इससे, गीत के जरिए, प्रेम की भावना को अलग-अलग दृष्टिकोणों से प्रस्तुत करने की सुविधा मिलती है। पुरुष आवाज में गाया गया गीत प्रेमी के मन की अभिव्यक्ति जैसा लगता है, जबकि महिला आवाज में वही शब्द और धुन सुनने पर भावनाओं का दूसरा पक्ष उभरता है।
‘दिल में हो तुम...’ और ‘चिरोदिनी तुमि जे अमार’ के बीच सबसे महत्वपूर्ण समानता बप्पी लाहिरी का संगीत और दोनों भाषाओं में प्रेम को स्वर देने की उनकी क्षमता है। हालांकि, इन दोनों गीतों के बीच संबंध को समझते समय एक जरूरी अंतर बनाए रखना चाहिए। केवल एक ही संगीतकार के दोनों फिल्मों से जुड़े होने और दोनों गीतों के रोमांटिक मिजाज में समानता के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक गीत दूसरे की धुन का सीधा रूपांतरण है। दोनों की अपनी अलग संगीतात्मक पहचान है। ‘दिल में हो तुम...’ हिंदी फिल्म के संदर्भ में प्रेम की निजी अनुभूति को सामने लाता है, जबकि ‘चिरोदिनी तुमि जे अमार’ बंगाली प्रेमगीतों की परंपरा में एक ऐसा गीत बन गया, जिसकी लोकप्रियता फिल्म से भी आगे बनी रही।
‘अमर संगी’ की सफलता में इस गीत की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। प्रसेनजीत चटर्जी के करियर में भी यह फिल्म एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। किशोर कुमार की आवाज में यह गीत प्रेम की स्थायित्वपूर्ण अभिव्यक्ति बनता है, जबकि आशा भोसले का संस्करण उसी भावना को एक अलग स्वर-रंग देता है। इस तरह दोनों भाषाओं की फिल्मों में पुरुष और महिला आवाजों के जरिए एक ही भाव को अलग-अलग ढंग से व्यक्त करने की संगीत-परंपरा यहां दिखाई देती है। यही तुलना ‘दिल में हो तुम...’ को सुनने का एक नया नजरिया भी देती है।
बप्पी लाहिरी की विशेषता यह थी कि वह हिंदी और बंगाली, दोनों फिल्म उद्योगों में अपनी अलग पहचान रखते थे। वह डिस्को संगीत की लोकप्रियता के दौर में भी रोमांटिक गीतों की ऐसी धुनें रचते रहे, जो केवल अपने समय की पसंद बनकर नहीं रह गईं। ‘दिल में हो तुम...’ और ‘चिरोदिनी तुमि जे अमार’ इस बात के उदाहरण हैं कि एक संगीतकार अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक परिवेशों में प्रेम की अनुभूति को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त कर सकता है।
आज भी ‘दिल में हो तुम...’ सुनते समय इसकी धुन की सरलता और स्वरों का आकर्षण महसूस किया जा सकता है। इसके दोनों संस्करण याद दिलाते हैं कि प्रेम का एहसास एक हो सकता है, लेकिन उसे व्यक्त करने की आवाजें अलग-अलग होती हैं। शायद यही इस गीत की सबसे बड़ी खूबी है कि समय बदलने के बावजूद इसकी धुन में बसा अपनापन कम नहीं होता है।

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